छतरपुर में अब ‘जहर मिलाने की साजिश’ का बड़ा खुलासा

जल संकट की पड़ताल करने पहुँचे पत्रकार पर ही झूठी एफआईआर दर्ज कराई
किसी प्रकार की मारपीट ना होने के बावजूद घटना के लगभग 5 घंटे बाद झूठी एफआईआर
रिपोर्ट उदय नारायण अवस्थी, छतरपुर
छतरपुर। जब अपराधी को जाति का कवच मिल जाता हैं तो कानून कमजोर पड़ता है। जब नेता गुंडा तत्वों को संरक्षण देता है तो आम आदमी का भरोसा टूटता है। और जब न्याय की जगह ‘अपनापन’ हावी हो जाता है तो व्यवस्था विवाद को जन्म देती है। शहर के सिविल लाइन थाना में दर्ज एक कथित झूठी एफआईआर ने भी अब यही नया और चौंकाने वाला मोड़ ले लिया है जिसमें राजनीतिक रूप से यादवों के दबदबे के बीच वरिष्ठ पत्रकार राकेश रिछारिया पर मनगढ़ंत आरोपों के आधार पर मामला दर्ज करा दिया। दर्ज मामले को लेकर जहां पहले से सवाल उठ रहे थे, वहीं अब सामने आई नई जानकारी ने पूरे प्रकरण को गंभीर जनसुरक्षा से जोड़ दिया है।
घटना में शामिल बताए जा रहे युवकों के नाम भी सामने आए हैं, जिनमें अनिल यादव, अमित, अमरजीत, सत्यम उर्फ राजा (जिसे निगरानीशुदा बदमाश बताया जा रहा है), राजुल राजा, नरेश और तीन अन्य शामिल हैं। इस खबर में नया मोड़ तब आता है जब किसी प्रकार की मारपीट ना होने के बावजूद घटना के लगभग 5 घंटे बाद झूठी एफआईआर छतरपुर की स्थानीय विधायक और बेटे के दबाव में दर्ज करा दी जाती है कि उनके साथ मारपीट हुई है हालांकि, पुलिस की ओर से अब तक इन नामों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
जानकारी के अनुसार, राकेश रिछारिया बीते दिन बूढ़ा बांध स्थित पेयजल फिल्टर प्लांट पर शहर की पेयजल आपूर्ति की स्थिति का जायजा लेने पहुंचे थे। यह दौरा किसी व्यक्तिगत कारण से नहीं, बल्कि जनता से लगातार मिल रही शिकायतों के क्रॉस चेक, फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्टिंग और मीडिया कवरेज के उद्देश्य से किया गया था। दोपहर के समय जब वे प्लांट परिसर में पहुंचे, तब वहां जो कुछ सामने आया, उसने पूरे मामले की दिशा ही बदल दी।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, प्लांट परिसर में कुछ युवक संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त थे। जब पत्रकार रिछारिया ने उनसे पूछताछ की, तो वे नशे की हालत में थे और कथित तौर पर उन्होंने बेहद खतरनाक इरादे जाहिर किए। आरोप है कि इन युवकों ने कहा कि प्लांट संचालन से जुड़ी कंपनी से उन्हें ‘हिस्सा’ और रंगदारी नहीं मिल रही, इसलिए वे जल आपूर्ति में जहर मिलाने की तैयारी कर रहे हैं।
यह सुनते ही मामला केवल एक रिपोर्टिंग कवरेज तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संभावित बड़े जनहानि की आशंका में बदल गया। बताया जा रहा है कि राकेश रिछारिया ने तत्काल सक्रियता दिखाते हुए न केवल प्लांट प्रबंधन को इसकी सूचना दी, बल्कि आसपास के ग्रामीणों को बुलाकर मौके पर स्थिति को नियंत्रित किया। स्थानीय लोगों की मदद से इन संदिग्ध युवकों को वहां से हटाया गया, जिससे एक बड़ी अनहोनी टल गई।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद सवाल यह उठता है कि एक संभावित जनविनाशकारी साजिश को रोकने वाले पत्रकार पर ही बिना गहन जांच के एफआईआर क्यों दर्ज कर दी गई? स्थानीय पत्रकारों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि इस मामले में व्यक्तिगत द्वेष और राजनीतिक पूर्वाग्रह ने भूमिका निभाई है। उनका कहना है कि कुछ प्रभावशाली लोगों जिसमें नगर की विधायक का नाम आ रहा है, उन्होंने आपराधिक तत्वों का सहारा लेकर पत्रकार राकेश रिछारिया को फंसाने की साजिश रच डाली।
बुंदेलखंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन सहित अन्य संगठनों ने किया विरोध
मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब पत्रकार संगठनों ने इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला करार दिया। बुंदेलखंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन सहित अन्य संगठनों ने इस कार्रवाई का विरोध करते हुए सिविल लाइन थाने में दर्ज एफआईआर को तत्काल निरस्त करने की मांग उठाई है। पत्रकारों का कहना है कि अगर एक पत्रकार, जो जनता की समस्याओं को उजागर करने और संभावित खतरे को रोकने का काम कर रहा है, उसे ही निशाना बनाया जाएगा, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।
पत्रकारों ने यह भी मांग की है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और पुनः जांच कराई जाए। उनका कहना है कि यदि स्थानीय ग्रामीणों और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान दर्ज किए जाएं, तो सच्चाई सामने आ सकती है और “दूध का दूध, पानी का पानी” हो जाएगा।
इस बीच, शहर में यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। आम नागरिक भी यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिर जल आपूर्ति जैसी संवेदनशील व्यवस्था में अगर वाकई छेड़छाड़ और खुराफ़ात की कोशिश हुई थी, तो उस पर सख्त कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही? और अगर नहीं हुई, तो फिर पत्रकार पर इतनी जल्दी कार्रवाई कैसे हो गई?
पत्रकारिता करने की कीमत अब झूठे मुकदमे बनते जा रहे हैं?
यह प्रकरण केवल एक एफआईआर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कई गंभीर सवाल खड़े करता है—क्या सच को सामने लाना अब जोखिम भरा हो गया है? क्या पत्रकारिता करने की कीमत अब झूठे मुकदमे बनते जा रहे हैं? और सबसे अहम, क्या जनहित में काम करने वालों को ही निशाना बनाया जाएगा?
फिलहाल, सभी की निगाहें प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। अगर निष्पक्ष जांच होती है, तो न केवल इस मामले की सच्चाई सामने आएगी, बल्कि यह भी तय होगा कि छतरपुर में कानून का राज मजबूत है या फिर प्रभाव और दबाव के आगे व्यवस्था झुक रही है। सवाल सीधा है कि क्या नेता का काम गुंडों का साथ देना है? या फिर कानून और संविधान की रक्षा करना? छतरपुर की घटना यही संकेत दे रही है।

