तपते बुंदेलखंड में इंसानों के साथ पशु-पक्षी भी बेहाल


‘हीट चेंबर’ में तब्दील हुए छतरपुर जिले में नगर पालिका प्रशासन के इंतजाम नाकाफी
अच्छी बारिश के बावजूद नदी, नाले, तालाब और पोखर सूखे
रिपोर्ट। उदय नारायण अवस्थी, छतरपुर
छतरपुर। बुंदेलखंड इस समय भीषण गर्मी की ऐसी मार झेल रहा है, जिसने जनजीवन को संकट में डाल दिया है। खजुराहो से लेकर नौगांव तक तापमान 46 डिग्री के पार पहुंच चुका है और पूरा इलाका मानो आग के भट्ठे में बदल गया हो। तपती धरती… सूखे तालाब… आसमान से बरसती आग और पानी की एक-एक बूंद को तरसते इंसान से लेकर बेजुबान पक्षी तक सब परेशान हैं।
अच्छी बारिश के दावों के बावजूद नदी, नाले, तालाब और पोखर सूखे पड़े हैं। जंगलों में पशु-पक्षी प्यास से बेहाल हैं, शहरों में बिजली व्यवस्था चरमरा रही है और अस्पतालों में लू से पीड़ित मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। सवाल यह है कि आखिर इस भीषण संकट से निपटने के लिए प्रशासन, नगर पालिका और समाज कितने तैयार हैं? दरअसल 46 डिग्री की आग उगलती धरती पर राहत के इंतज़ाम नाकाफी हैं। सूखते तालाब और प्यास से तड़पते अंचल में इस समय गर्मी ने अपने विकराल रूप से लोगों की जिंदगी को झुलसा दिया है। हालात इतने भयावह हो चुके हैं कि धरती मानो आग उगल रही हो। पत्थरों और ग्रेनाइट पहाड़ों के लिए प्रसिद्ध ये जिला इस समय देश के सबसे गर्म शहरों में शुमार हो चुका है। यहां अधिकतम तापमान 46 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच रहा है।
बता दें कि देश के टॉप फाइव सबसे अधिक गर्म शहरों में छतरपुर शामिल हो चुका है। प्रदेश के 13 शहरों में तापमान 44 से 46 डिग्री के बीच बना हुआ है, जबकि 27 शहरों में पारा 42 डिग्री से ऊपर पहुंच चुका है। ऐसे में बुंदेलखंड का पूरा इलाका मानो ‘हीट चेंबर’ में तब्दील हो गया है। सुबह होते ही तेज धूप और लपट जैसी गर्म हवाएं लोगों को घरों में कैद होने को मजबूर कर रही हैं। दोपहर के समय सड़कें सूनी दिखाई देने लगी हैं और लोग केवल बेहद जरूरी काम होने पर ही बाहर निकल रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस बार की गर्मी ने पिछले कई वर्षों के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।
प्रशासन और नगर पालिका क्या कर सकते हैं?
ऐसे हालात में केवल चेतावनियां पर्याप्त नहीं हैं। प्रशासन और नगर पालिकाओं को जमीनी स्तर पर तत्काल प्रभाव से राहत कार्य शुरू करने की जरूरत है। शहरों और गांवों में सार्वजनिक स्थानों पर प्याऊ खोले जाने चाहिए। बस स्टैंड, बाजार, अस्पताल, स्कूल और प्रमुख चौराहों पर ठंडे पानी की व्यवस्था की जा सकती है। नगर पालिका को टैंकरों के माध्यम से सूखे तालाबों और जलाशयों में पानी भरवाने की योजना बनानी चाहिए।
पशु-पक्षियों के लिए विशेष जल पात्र रखने की व्यवस्था हर वार्ड और सार्वजनिक स्थान पर की जा सकती है। पार्कों, सरकारी भवनों, मंदिर परिसरों और बाजारों में मिट्टी के सकोरे और पानी के बड़े बर्तन रखे जाएं, ताकि पक्षियों को राहत मिल सके। पंचायत स्तर पर गांवों में पुराने तालाबों और कुओं की सफाई कर उनमें पानी रोका जा सकता है। यदि समय रहते यह कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले दिनों में वन्यजीवों और पक्षियों की मौतों का आंकड़ा बढ़ सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में किसान और पशुपालक गांव के सार्वजनिक स्थलों पर मवेशियों के लिए पानी की टंकियां रख सकते हैं। धार्मिक संस्थाओं को भी इस दिशा में आगे आने की जरूरत है।
पशु-पक्षी पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष कर रहे
मौसम विभाग ने आगामी दिनों में राहत की उम्मीद बेहद कम बताई है। विभाग के अनुसार तापमान 44 से 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है और कई इलाकों में लू का असर और बढ़ सकता है। विशेषज्ञों ने लोगों को शरीर को हाइड्रेट रखने, अधिक पानी पीने और धूप से बचने की सलाह दी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी अच्छी बारिश होने के दावों के बावजूद आखिर नदी, नाले, तालाब और पोखर क्यों सूखते जा रहे हैं?
बुंदेलखंड की धरती पर जगह-जगह जलस्रोतों का सूख जाना केवल मौसम की मार नहीं बल्कि जल संरक्षण की विफलता की कहानी भी बयां करता है। गांवों में बने छोटे तालाब, पोखर और कुएं अब सूखी जमीन में बदलते जा रहे हैं। कई स्थानों पर जानवर पानी की तलाश में कई किलोमीटर तक भटक रहे हैं।
ग्रेनाइट पहाड़ों और जंगलों से घिरे इस जिले में स्थिति और भी चिंताजनक हो चुकी है। यहां के पहाड़ अपनी प्राकृतिक खूबसूरती और जैव विविधता के लिए जाने जाते हैं। बरसात के दिनों में यह इलाका हरियाली से भर उठता है, लेकिन इस समय यहां की तस्वीर भयावह दिखाई दे रही है। पहाड़ों में जंगली पेड़ों के बीच रहने वाले पशु-पक्षी पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जंगलों के छोटे जलाशय सूख चुके हैं और वन्यजीवों के सामने प्यास का संकट खड़ा हो गया है।
ग्रामीण जो भेड़-बकरियां चराने इन पहाड़ों में जाते हैं, वे बताते हैं कि कई स्थानों पर पक्षी सूखे जलस्रोतों के किनारे मंडराते दिखाई देते हैं। बंदर, नीलगाय और अन्य जानवर आबादी की ओर बढ़ रहे हैं क्योंकि जंगलों में पानी खत्म हो चुका है। कई जगह पक्षियों के मरने की खबरें भी सामने आ रही हैं। यह स्थिति केवल पर्यावरणीय संकट नहीं बल्कि मानवीय संवेदनहीनता का भी आईना बनती जा रही है।
शहर और गांव दोनों जगह हालत खराब
भीषण गर्मी का असर अब बिजली व्यवस्था पर भी साफ दिखाई देने लगा है। लगातार बढ़ती बिजली खपत के कारण ट्रांसफार्मरों पर दबाव बढ़ गया है। ओवरहीटिंग और फाल्ट से बचाने के लिए बिजली विभाग कई स्थानों पर ट्रांसफार्मरों के पास कूलर लगाकर उन्हें ठंडा रखने की कोशिश कर रहा है, ताकि बिजली आपूर्ति बाधित न हो। बावजूद इसके शहर और ग्रामीण इलाकों में लगातार बिजली कटौती लोगों की परेशानी बढ़ा रही है। रात में बिजली गुल होने से लोग ठीक से सो तक नहीं पा रहे हैं। कई इलाकों में स्थानीय लोगों ने प्रदर्शन भी शुरू कर दिए हैं और हेल्पलाइन पर लगातार शिकायतें दर्ज कराई जा रही हैं।
गर्मी और उमस का असर स्वास्थ्य सेवाओं पर भी दिखाई देने लगा है। अस्पतालों में डिहाइड्रेशन, चक्कर आना, उल्टी, बुखार और लू से पीड़ित मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। डॉक्टरों ने विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों को दोपहर के समय घर से बाहर न निकलने की सलाह दी है। चिकित्सकों के अनुसार शरीर में पानी की कमी कई गंभीर बीमारियों को जन्म दे सकती है। लोगों को ओआरएस, छाछ, नींबू पानी और अधिक मात्रा में पानी पीने की सलाह दी जा रही है।
राहत के आसार कम
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले दिनों में बुंदेलखंड में गर्मी और बढ़ सकती है। लू और तेज गर्म हवाओं का असर अगले कई दिनों तक जारी रहने की संभावना है। तापमान में फिलहाल किसी बड़ी गिरावट के संकेत नहीं हैं।

