July 21, 2024

*राख पर अब उनकी लहराए समन्दर भी तो क्या*!!— *सो गये जो उम्र भर हसरत लिए वर्षांत की*!!

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*राख पर अब उनकी लहराए समन्दर भी तो क्या*!!—
*सो गये जो उम्र भर हसरत लिए वर्षांत की*!!

अहंकार में डूबे तिरस्कार की उबलती धारा में बह कर तरोताजा बने रहने का ख्वाब देखने वाला खुद को खुदा भले ही समझता हो मगर जमाना हमेशा हिकारत की नजर से ही देखता है!जिनके दिल में जीते जी खुशियों का भाव नज़र नहीं आया वही मरने के बाद दिखावा में इस कदर खार ख्वाह बन बैठते जिसको देखकर लोग हैरत में पड़ जाते हैं!यह नये जमाने का फंडा है! गजब का फल फूल रहा धंधा है!हर आदमी स्वार्थ में अंधा है!फिर भी चाहत की बस्ती में बशर करने वाला इतने पर ही भावुक हो जाते है की आखिरी में यही तो जनाजे में देते कन्धा है!सोच के समन्दर में जब तक सुनामी नहीं आती हर कोई साफ गोई में लगा रहता है!जिस दिन ख्वाब के तट बन्ध टूटने लगते है- स्वार्थ की बस्ती में तबाही का पानी हकीकत के धरातल पर जलजला पैदा कर देता हैं!बदलते परिवेश में बदलाव की हवाएं अब जहरीली होने लगी है।हर तरफ अजीब किस्म की दहशत है!कभी कच्ची मिट्टी की मकानों में आदमी खुशियों का सौगात लिए आनन्द के साथ रह कर एक दुसरे के दर्द में सहभागी बनता था!आज पक्की मकानों के भीतर पत्थर दिल लोग वैमनस्यता की बग्घी पर सवार केवल अधिकार को तवज्जो देते हैं? लेकिन जब कर्तव्य की बात आती है तब कदम कदम पर टकराव करने में गुरेज नहीं करते !आज  हर परिवार बिखर रहा है!आपसी लगाव आपसी सद्भाव का अभाव हर तरफ देखा जा है। लाज लिहाज आज अब गुजरे जमाने की बात हो गया!दकियानूसी सोच आधुनिकता की खोज है जिसकी चपेट में आकर भारतीय संस्कृति जड़मूल से खत्म हो रही है।हाथ में मोबाईल नये जमाने की स्टाईल है!दोस्ती की फेहरिस्त में हजारों है लेकिन वक्त बिगडने साथी कोई नही! गिरावट के इस दौर में अजीब नजारा है! पुरातन संस्कृति पुरातन धरोहर का बिगड़ चुका खेल सारा है!परिवार की परिभाषा वक्त के साथ बदल रही है!आलीशान हवेली भी बीरानी का मंजर लिए सिसकने लगी है।अजनबी शहर अजनबी लोगों के बीच तन्हा तकदीर लिए घुट घुट कर जीना फैसन बन गया!लेकिन मान, सम्मान ,शान की दहलीज पर सम्मान के साथ बशर अच्छा नहीं लगता! इस लिए की उनके अब जो अपने थे वो पराए हो गये !जो गैर थे हम साए हो गये! जहां भारतीय संस्कृति में जाना वर्जित किया गया वहीं के लोग अब दीवाने हैं मां बाप बन गये अन जाने है!भाई भाई न रहा!घर घर न रहा! गांव गांव न रहा! चारो तरफ मायूसी का मंजर है! हर आदमी स्वार्थ के स्याह चादर में लिपटा अपनो के ही खिलाफ उगल रहा जहर है!कितना मुश्किल भरा दौर है! अरमानों के बादल बहसी बदकिस्मत की हवाओं से टकरा कर अपना अस्तित्व ही खो रहा हैं।जो कल तक हरे बगीचे में खिलते पुष्पों को देखकर मुस्कुराते थे! वहीं आज खिजां के दौर में जहरीली हो चुकी बागवानी को देखकर सर पकड़ कर रोते है! आखिर कितना गिर चुका है आदमी! सम्बन्धों की बेकद्री से तिजारत आम बात हो गयी है!उस माली से पूछिए जिसने बड़ी शिद्दत से बागवानी को खून पसीना से सींचकर हरा भरा किया!मगर उसे क्या पता था सारे के सारे फल जहरीला ही निकलेंगे!ज़िन्दगी के सारे अरमान अकस्मात दुर्भाग्य के आये तूफान में धाराशाई हो जायेंगे!जीवन के हर लम्हे तमाशाई हो जायेगे।—— वास्तविकता हमेशा अपने वजूद का एहसास कराती है! लेकिन माया के आवरण में मन की गति स्वार्थ के प्रभाव में प्रदूषित हो ही जाती है! विचार बदल जाते हैं! जब तक ख्याल आता है उम्र का कारवां मन्जिल पर दस्तक देने लगता है!पश्चाताप की उठती लहरें बार बार धिक्कारती है सब कुछ गंवा के होश में आया तो क्या आया-!इस मतलबी संसार में किसी का कोई नहीं!नेह के दीपक में स्नेह की बाती तभी तक जलेगी जब तक स्वार्थ का तेल जलता रहेगा! वर्ना सच तो यही है कौन देता है उम्र भर सहारा! लोग तो जनाजे में भी कंधे बदलते रहते हैं!सच सच होता है क्षण भन्गूर इस माया लोक में जब तक सांस है सभी को आस है! सम्हल कर निकल भाई मौत कभी भी इस लोक से बेदखल कर सकती है।जब तक जीओ परमार्थ के पथ का अनुगामी बनो।साथ केवल कर्म धर्म ही जायेगा।

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