शिक्षण संस्थाओं पर जातिगत वर्चस्व को लेकर सख्त रुख, कहा सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों की प्रबंध समिति जाति समूहों के हाथों में सिमटना संविधान के खिलाफ

प्रमुख सचिव बेसिक शिक्षा व रजिस्ट्रार फर्म सोसायटीज एवं चिट्स से मांगा हलफनामा, पूछा राज्य के पास इसे रोकने का तंत्र है या नहीं
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फतेहपुर स्थित धाता इंटर कॉलेज की प्रबंध समिति के चुनाव विवाद की सुनवाई करते हुए राज्य में शिक्षण संस्थाओं और उनका संचालन करने वाली सोसायटियों में लंबे समय से चल रहे गुटीय और जातिगत वर्चस्व पर गंभीर चिंता जताई है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने यह टिप्पणी धनराज सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य मामले में सुनवाई के दौरान की।
याची धनराज सिंह ने जिला विद्यालय निरीक्षक, फतेहपुर द्वारा 20 जून 2026 को जारी उस पत्र को चुनौती दी थी, जिसमें धाता इंटर कॉलेज की प्रबंध समिति का चुनाव कराने का निर्देश दिया गया था। याची का कहना था कि जिस निवर्तमान समिति का कार्यकाल समाप्त हो चुका है, वह चुनाव कराने के लिए सक्षम नहीं है और चुनाव उत्तर प्रदेश इंटरमीडिएट एजुकेशन एक्ट, 1921 की धारा 16-डी के तहत प्राधिकृत नियंत्रक की नियुक्ति के बाद ही कराया जाना चाहिए।
कोर्ट को बताया गया कि यह विवाद वर्ष 2014 से चला आ रहा है और इस बीच धाता कॉलेज व उससे जुड़ी सोसाइटी को लेकर पांच अलग-अलग दौर की मुकदमेबाजी हो चुकी है। कॉलेज की प्रबंध समिति का आखिरी चुनाव 2011 में हुआ था, जिसके बाद अदालती स्थगन आदेशों के चलते दोबारा चुनाव नहीं हो सका।
अदालत ने पाया कि यह कोई अकेला मामला नहीं है। एक संबद्ध याचिका बरहसेनी कॉलेज सोसाइटी मामला का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि अलीगढ़ स्थित वार्ष्णेय महाविद्यालय को संचालित करने वाली सोसाइटी में भी बाईलॉज के आधार पर एक खास जाति के अलावा अन्य को मतदान से वंचित करने के आरोप लगे हैं।
अदालत ने कहा कि राज्य से पर्याप्त वित्तीय सहायता प्राप्त संस्थाओं का प्रबंधन किसी एक जाति समूह के हाथों में सिमटा रहना संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 की भावना के विपरीत है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 जैसे औपनिवेशिक कानून में आज सार्वजनिक धन से संचालित संस्थाओं की निगरानी के लिए पर्याप्त प्रावधान नहीं हैं।
कोर्ट ने मुख्य सचिव बेसिक एवं माध्यमिक शिक्षा तथा रजिस्ट्रार, फर्म्स, सोसाइटीज एंड चिट्स को तीन सप्ताह के भीतर व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर यह बताने को कहा है कि क्या राज्य के पास ऐसी सोसाइटियों में समय पर चुनाव सुनिश्चित करने और जाति, धर्म व लिंग के आधार पर भेदभाव रोकने का कोई तंत्र मौजूद है।संबंधित अधिकारियों को यह सर्वेक्षण करने का निर्देश दिया गया है कि प्रदेश में कितनी सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थाएं किसी एक जाति समूह के प्रभुत्व में चल रही हैं। इसके लिए स्थानीय थानाध्यक्ष और तहसीलदार से सहयोग लेने को कहा गया है।कोर्ट ने सुझाव दिया कि ऐसी संस्थाओं के प्रबंधन में शिक्षाविदों, समाजसेवियों, न्यायविदों, उद्योगपतियों, पत्रकारों और चार्टर्ड अकाउंटेंट्स जैसे पेशेवरों को जाति-निरपेक्ष आधार पर शामिल किए जाने की व्यवहार्यता पर विचार करने को कहा। अदालत ने विवादों के निपटारे के लिए वर्तमान में अधिकृत उप-जिलाधिकारी के पास पहले से मौजूद प्रशासनिक कार्यभार को देखते हुए किसी अधिक उपयुक्त फोरम या समय-सीमा तय किए जाने पर भी राज्य से जवाब मांगा है।और जिला विद्यालय निरीक्षक के 20 जून 2026 के पत्र का प्रभाव अगली सुनवाई तक स्थगित रखा गया है, और कहा है कि हालांकि आवश्यक होने पर धारा 16-डी के तहत प्राधिकृत नियंत्रक नियुक्त करने में यह आदेश बाधा नहीं बनेगा।
अदालत ने इस विषय पर शोध और सहायता के लिए शिक्षाविदों, विद्वानों और शोध संस्थानों को आमंत्रित किया है। साथ ही आदेश की प्रति भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज को भी भेजने का निर्देश दिया गया है, ताकि विषय-विशेषज्ञ अपनी राय अदालत के समक्ष रख सकें।
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उसने अभी तक इन प्रश्नों पर कोई राय कायम नहीं की है और यह टिप्पणियां किसी संस्था या व्यक्ति के विरुद्ध निष्कर्ष के रूप में नहीं ली जानी चाहिए। मामले की अगली सुनवाई 8 सितंबर 2026 को होगी।

