‘बाल रंग उत्सव’ में ‘युगधारा’ ने कराई साहित्य की यात्रा, ‘जामुन का पेड़’ ने लालफीताशाही पर कसा व्यंग्य
‘बाल रंग उत्सव’ में ‘युगधारा’ ने कराई साहित्य की यात्रा, ‘जामुन का पेड़’ ने लालफीताशाही पर कसा व्यंग्य

प्रयागराज ११ अगस्त। कभी शब्दों ने मंच पर जन्म लिया, कभी इतिहास ने संवादों का रूप धरा और कभी एक जामुन के पेड़ ने पूरी सरकारी व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर दिया। अवसर था उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, प्रयागराज, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा ‘शिक्षा में रंगमंच’ के अंतर्गत आयोजित ‘बाल रंग उत्सव’ का, जहां मंगलवार को बाल कलाकारों ने अपनी दमदार प्रस्तुतियों से सभागार को जीवंत कर दिया।
सांस्कृतिक केन्द्र प्रेक्षागृह में आयोजित उत्सव का शुभारंभ मुख्य अतिथि प्रो. आभा त्रिपाठी, कुलभास्कर आश्रम पी.जी. कॉलेज, प्रयागराज एवं प्रान्तीय उपाध्यक्ष, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, विशिष्ट अतिथि मनीष कुमार त्रिपाठी, के.वी.ए.एफ.एस. एयर फोर्स, मनौरी, प्रयागराज, अनिल कुमार, बेसिक शिक्षा अधिकारी, प्रयागराज, केन्द्र निदेशक सुदेश शर्मा, उपनिदेशक डॉ. मुकेश उपाध्याय एवं कार्यक्रम सलाहकार कल्पना सहाय ने दीप प्रज्वलित कर किया।
पहली प्रस्तुति में चाचा नेहरू बालिका इंटर कॉलेज, बर्रा, कानपुर के कक्षा 6 से 12 तक के विद्यार्थियों ने नाट्य निर्देशक नीरज कुशवाहा के निर्देशन में ‘युगधारा’ प्रस्तुत किया।
मंच पर जैसे ही प्रस्तुति शुरू हुई, भारतीय साहित्य की सदियों पुरानी यात्रा जीवंत हो उठी। आदिकाल से आधुनिक काल तक, साहित्य के चार प्रमुख युग आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल और आधुनिक काल अपने विचार, संवेदना और सांस्कृतिक चेतना के साथ दर्शकों के सामने आते चले गए।
सूरदास, तुलसीदास, रसखान जैसे कालजयी साहित्यकारों की रचनाओं ने मंच को साहित्यिक रंगों से भर दिया। संवादों के साथ संगीत, नृत्य और अभिनय का सुंदर संयोजन दर्शकों को साहित्य की उस यात्रा पर ले गया, जहां हर युग की अपनी आवाज थी, अपना भाव था और अपनी कहानी।
सवैया, चौपाई, दोहा, आल्हा शैली के गीत और लोकगीतों के समावेश ने प्रस्तुति को और प्रभावशाली बना दिया। प्रस्तुति का सबसे मार्मिक पक्ष मां गंगा की वर्तमान दुर्दशा को उजागर करना रहा। प्रदूषण और मानवीय उपेक्षा से आहत गंगा की पीड़ा को बाल कलाकारों ने संवेदनशीलता के साथ मंच पर उतारा। नाटक के माध्यम से गंगा को पुनर्जीवन के लिए सामूहिक प्रयास करने का भावपूर्ण संदेश दिया गया। प्रस्तुति ने यह प्रश्न भी उठाया कि यदि गंगा की धारा को निर्मल और अविरल बनाए रखने की जिम्मेदारी आज की पीढ़ी नहीं निभाएगी, तो आने वाली पीढ़ियों को हम कैसी गंगा सौंपेंगे। ‘जामुन का पेड़’ एक पेड़, एक आदमी और फाइलों का जंगल!
इसके बाद मंच पर आया ‘जामुन का पेड़’और शुरू हुई ऐसी कहानी, जिसमें हंसी भी थी, व्यंग्य भी और व्यवस्था पर गंभीर सवाल भी। नाट्य निर्देशक शिवेन्द्र शुक्ला के निर्देशन में एल.एस. मेमोरियल स्कूल, बगौता, जिला छतरपुर (मध्य प्रदेश) के 15 बाल कलाकारों ने कृष्ण चंदर की प्रसिद्ध कहानी पर आधारित इस नाटक का मंचन किया। यह कहानी एनसीईआरटी की कक्षा 11 की हिंदी पुस्तक ‘आरोह’ के सातवें अध्याय में शामिल है।
कहानी शुरू होती है सचिवालय परिसर में गिरे एक जामुन के पेड़ से, जिसके नीचे एक व्यक्ति दबा पड़ा है। माली अधिकारियों को खबर करता है। सवाल उठता है, पेड़ काटा जाए या नहीं? बस फिर क्या था! फाइल चल पड़ी वन विभाग से कृषि विभाग, कृषि से उद्यान विभाग और फिर दूसरे विभागों की चौखट तक।
आदमी पेड़ के नीचे दबा जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करता रहा और सरकारी फाइल अपनी रफ्तार से चलती रही। जब तमाम औपचारिकताएं पूरी हुईं और फाइल पर हस्ताक्षर हुए, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
नाटक ने बेहद सरल लेकिन तीखे अंदाज में लालफीताशाही, विभागीय उलझनों और संवेदनहीन प्रशासनिक व्यवस्था पर करारा व्यंग्य किया। बाल कलाकारों के संवाद, हाव-भाव और मंचीय प्रस्तुति ने दर्शकों को खूब गुदगुदाया, लेकिन हंसी के पीछे छिपा सवाल सभागार में गूंजता रहा क्या इंसान से ज्यादा जरूरी फाइल है? नाटक में समर सिंह यादव, प्राग्नेंद्र कुशवाहा, शैंकी यादव, राज पाठक एवं लवेश अहिरवार ने अपने शानदार अभिनय से दर्शकों को अंत तक बांधे रखा। कार्यक्रम के अंत में मुख्य अतिथि एवं केंद्र निदेशक ने नाट्य निर्देशकों को अंगवस्त्र ,पौधा एवं स्मृति चिन्ह तथा बच्चों को प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया एवं नाट्य प्रस्तुति में उत्कृष्ट अभिनेता एवं संगीत के लिए पुरस्कार भी प्रदान किया गया। कार्यक्रम का संचालन आकाश अग्रवाल ने किया।

