August 11, 2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: चौथी संतान के लिए मातृत्व अवकाश नहीं मिलेगा, याचिका खारिज

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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: चौथी संतान के लिए मातृत्व अवकाश नहीं मिलेगा, याचिका खारिज

प्रयागराज। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी महिला सरकारी सेवक की पहले से ही दो या अधिक जीवित संतानें हैं, तो उसे मातृत्व (प्रसूति) अवकाश की पात्रता नहीं होगी, भले ही वह किसी विशेष प्रसव के लिए पहली बार यह अवकाश मांग रही हो।

यह आदेश न्यायमूर्ति श्रीमती मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने श्रीमती शशि कुमारी की याचिका पर दिया है।
याचिकाकर्ता ने 19 जून 2026 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनके चौथे बच्चे के लिए मातृत्व अवकाश की मांग को खारिज कर दिया गया था। याचिका में यह भी प्रार्थना की गई थी कि विभाग को छह माह का मातृत्व अवकाश देने का निर्देश दिया जाए।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने तर्क दिया कि उन्होंने अपनी पहली तीन संतानों के जन्म पर कोई अवकाश नहीं लिया था, और चूंकि वह चौथी संतान के लिए पहली बार यह लाभ ले रही हैं, इसलिए उन्हें इससे इन्कार करने वाला आदेश मनमाना और कानून की दृष्टि से गलत है।

राज्य की ओर से अतिरिक्त मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने कहा कि याचिकाकर्ता पहले ही मातृत्व अवकाश ले चुकी हैं। कोर्ट में यह जानकारी दी कि वित्तीय हस्त पुस्तिका के खंड-II, भाग 2 से 4 (अध्याय-10) के प्रावधानों के अनुसार:- प्रसूति अवकाश प्रसव की तिथि से 180 दिनों तक स्वीकृत किया जाता है। यह अवकाश तभी दोबारा मिल सकता है जब पिछले स्वीकृत अवकाश की समाप्ति के दो वर्ष बीत चुके हों।सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि यदि किसी महिला सरकारी सेवक की दो या अधिक जीवित संतानें हैं, तो उसे प्रसूति अवकाश स्वीकृत नहीं किया जा सकता, चाहे यह अवकाश अन्यथा देय क्यों न हो।

गर्भपात के मामलों के लिए अलग से 6 सप्ताह के अवकाश का प्रावधान है, जिस पर पहले तीन बार की सीमा 1990 की एक अधिसूचना के जरिए पहले ही हटाई जा चुकी है।

कोर्ट ने कहा कि याचिका के साथ मूल दस्तावेजों की फोटोस्टेट प्रतियां नहीं लगाई गई थीं, बल्कि केवल टाइप की गई प्रतियां संलग्न थीं, जिनमें टाइपिंग की त्रुटियां पाई गईं । इससे कोर्ट को निर्णय लेने में कठिनाई हुई। इस पर रिपोर्टिंग सेक्शन को निर्देश दिया गया कि भविष्य में याचिकाओं के साथ उचित फोटोस्टेट प्रतियां भी संलग्न की जाएं, और इस आदेश की प्रति रजिस्ट्रार जनरल के समक्ष भी भेजी जाए।

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