April 28, 2026

सार्वजनिक धन के गबन के मामले में विवेचना जरूरी मनरेगा घोटाले के आरोपियों की याचिका की खारिज

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सार्वजनिक धन के गबन के मामले में विवेचना जरूरी मनरेगा घोटाले के आरोपियों की याचिका की खारिज

प्रयागराज:इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सार्वजनिक धन के गबन से जुड़े मामलों में जांच को किसी भी तकनीकी आधार पर रोका नहीं जा सकता है। यह आदेश न्यायमूर्ति जे जे मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने सिद्धार्थनगर जिले के मनरेगा घोटाले से जुड़ी एक याचिका को खारिज करते हुएदिया है। न्यायालय ने कहा कि यदि किसी सार्वजनिक प्राधिकरण ने वित्तीय अनियमितता या आपराधिक विश्वासघात पाया है, तो उसकी गहन जांच कानूनी रूप से आवश्यक है।

यह मामला सिद्धार्थनगर के मनरेगा लोकपाल द्वारा की गई एक जांच से जुड़ा है, जिसमें याचिकाकर्ताओं पर 7,91,328 रुपये के आपराधिक विश्वासघात का आरोप लगाया गया था। लोकपाल की इसी रिपोर्ट के आधार पर याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज की गई थी। याचिकाकर्ताओं के विद्वान वकील ने न्यायालय में यह दलील दी थी कि उन्होंने लोकपाल के इस आदेश के विरुद्ध उत्तर प्रदेश सरकार के राज्य मनरेगा प्रकोष्ठ, लखनऊ में अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष अपील दायर कर रखी है। उनका तर्क था कि जब तक अपील पर कोई अंतिम निर्णय नहीं आ जाता, तब तक उनके विरुद्ध दर्ज की गई एफआईआर वैधानिक रूप से उचित नहीं है।
हालांकि, न्यायालय ने इन तर्कों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। माननीय न्यायाधीशों ने अपने आदेश में कहा कि सार्वजनिक धन की सुरक्षा सर्वोपरि है और एक बार जब गबन का मामला सामने आता है, तो उसकी जांच अनिवार्य हो जाती है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि एफआईआर दर्ज कराने वाले व्यक्ति की पहचान या पद से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि यदि अपराध संज्ञेय है, तो किसी भी सूचनाकर्ता को इसकी रिपोर्ट करने से नहीं रोका जा सकता। अदालत ने साफ किया कि मामले की सच्चाई जांच और भविष्य में होने वाले मुकदमे के दौरान ही स्पष्ट होगी।

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