August 14, 2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पॉक्सो के तहत सजा पलटी; वैवाहिक विवादों में बच्चों को मोहरा बनाने पर कड़ी चेतावनी

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पॉक्सो के तहत सजा पलटी; वैवाहिक विवादों में बच्चों को मोहरा बनाने पर कड़ी चेतावनी


प्रयागराज, इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने हald्वानी के डॉक्टर यतींद्र मोहन बहुगुणा और उनके भाई समोज बहुगुणा को पॉक्सो अधिनियम व भारतीय दंड संहिता के तहत लगे सभी आरोपों से बरी कर दिया और वाराणसी की निचली अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि गंभीर बाल यौन शोषण के आरोप दरअसल वैवाहिक व संपत्ति विवाद के दौरान दुर्भावना से रचे गए थे।
खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि मामले की जांच व मुकदमेबाजी से यह स्पष्ट हुआ कि शिकायत करने वाली पत्नी ने घटना के लगभग दो महीने बाद बिना ठोस कारण के एफआईआर दर्ज कराई, जबकि तब पति पहले ही तलाक की प्रक्रिया में था। मेडिकल रिपोर्टों ने अभियोजन के दावों को खारिज कर दिया; मेडिकल परीक्षक ने गवाही दी कि बालिका के शरीर पर कोई भी चोट या शोषण के लक्षण नहीं पाए गए, जो कथित कष्ट के समय आमतौर पर दर्ज होते हैं।
अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर चिंता जताई कि बाल गवाह को कथित तौर पर “पढ़ाकर-लिखाकर” उसके बयान तैयार कराए गए। परिवार की तस्वीरें और घरेलू कर्मचारियों के दिए गए बयानों से यह प्रमाणित हुआ कि पिता-पुत्री के संबंध प्रेमपूर्ण और घनिष्ठ रहे हैं तथा बच्ची ने पिता के साथ समय आनंदपूर्वक बिताया। इन तथ्यों के मद्देनजर उच्च न्यायालय ने निर्णय निकाला कि अपीलकर्ताओं को गलत तरीके से फंसाया गया था और उन्हें तत्काल जेल से मुक्त किया जाए।
नीचे दिए गए नोट में खंडपीठ ने वैवाहिक झगड़ों के निहितार्थों पर सख्त रूख अपनाया और कहा कि बच्चों को माता-पिता द्वारा प्रतिशोध या कस्टडी विवाद में हथियार बनाना एक खतरनाक और गैर-कानूनी प्रवृत्ति है जिसे रोका जाना चाहिए। न्यायालय ने ऐसे मामलों में सतर्कता बरतने और जांच-पड़ताल में सख्ती बरतने का निर्देश भी दिया।
फैसले में रिसर्च एसोसिएट श्री अभिषेक वर्मा के समर्पित शोध कार्य का आधिकारिक तौर पर उल्लेख कर उनकी सराहना की गई है। निर्णय का आदेश पारित होते ही अदालत ने अपीलकर्ताओं की जमानत संबंधी शर्तों पर भी छूट प्रदान कर उन्हें रिहा करने का निर्देश दिया।
मामले की कानूनी प्रक्रिया, तथ्यों की पड़ताल व फैसले की व्याख्या से स्पष्ट है कि बाल संरक्षण कानूनों के दुरुपयोग को रोकने के प्रति न्यायपालिका संवेदनशील है और झूठे आरोपों के गंभीर परिणामों पर कड़ी टिप्पणियों में रुचि लेती है।

 

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