भारतीय आकाश के सजग प्रहरी: प्रयागराज में मध्य वायु कमान की गौरवशाली विरासत

८०वें स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर, बामरौली की ऐतिहासिक विमानन भूमि से देश की संप्रभुता की रक्षा करने वाले जांबाज वायु योद्धाओं को हमारा नमन।
१. भारतीय विमानन का उद्गम स्थल
भारत के ८०वें स्वतंत्रता दिवस पर हमारी दृष्टि स्वाभाविक रूप से आकाश की ओर उठती है, जहाँ प्रयागराज के ऊपर मध्य वायु कमान (सीएसी) चौबीसों घंटे हमारी हवाई सीमाओं की रक्षा कर रही है
। मध्य वायु कमान की यह आधुनिक सुरक्षा प्रयागराज की उस भूमि पर स्थापित है जिसने भारतीय विमानन का इतिहास रचा था
। १८ फरवरी १९११ को कुंभ मेले के दौरान फ्रांसीसी पायलट हेनरी पिकेट ने बामरौली से नैनी के लिए पहली बार ‘हंबर-सोमर बाइप्लेन’ उड़ाकर ६,५०० पत्रों को गंगा नदी के पार पहुँचाया था, जिसे विश्व की पहली आधिकारिक एयरमेल उड़ान के रूप में दर्ज किया गया
।
१९२९ में बामरौली हवाई अड्डे की आधिकारिक स्थापना हुई
। इसके पास स्थित ऐतिहासिक बार्नेट होटल को १९६२ में भारतीय वायु सेना को सौंप दिया गया, जिसका नाम ‘एयर कमान हाउस’ रखा गया
। यह प्रयागराज और वायु सेना के ऐतिहासिक और अटूट संबंधों का प्रतीक है
।
२. भारत के हृदय स्थल का सामरिक कवच
मध्य वायु कमान की स्थापना १० जून १९६३ को रानी कुटीर, कोलकाता में हुई थी
। फरवरी १९६६ में एयर वाइस मार्शल सोंधी के नेतृत्व में इसका मुख्यालय प्रयागराज स्थानांतरित किया गया
। सीएसी की भौगोलिक सीमाएँ अब देश के आठ राज्यों—उत्तर प्रदेश, Bihar, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र और ओडिशा के कुछ हिस्सों तक फैली हुई हैं
। यह प्रयागराज से ही संचालित होकर पूरे देश के हृदय स्थल का सामरिक कवच बनी हुई है
।
३. दुश्मनों का दमन: छह दशकों का शौर्य
अपने गौरवशाली संस्कृत आदर्श वाक्य “दमनीया आत्मशत्रवः” (अर्थात ‘शत्रु का दमन करना’)
के तहत काम करते हुए, सीएसी के वायु योद्धाओं ने हर युद्ध में अद्वितीय शौर्य का प्रदर्शन किया है
। १९६२ और १९६५ के युद्धों में कमान के दस्तों ने दुर्गम हिमालय की चोटियों में विषम परिस्थितियों में रसद पहुँचाने और घायल जवानों को बचाने का काम किया
। १९६५ के युद्ध में आगरा के १०६ स्कवाड्रन के विंग कमांडर जग मोहन नाथ, एमवीसी एंड बार (जो दो बार महावीर चक्र पाने वाले वायु सेना के पहले अधिकारी हैं) ने कैनबरा विमान से दुश्मन की सीमा में घुसकर अत्यंत साहसिक रात के मिशनों को अंजाम दिया
।
१९७१ के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में सीएसी के कैनबरा विमानों ने कराची के ड्रिग रोड स्थित ईंधन डिपो पर सटीक हमले कर दुश्मन के ६० प्रतिशत तेल भंडार को नष्ट कर दिया
। १९९९ के कारगिल युद्ध (ऑपरेशन सफेद सागर) में मिराज २००० विमानों ने टाइगर हिल और मुंथो ढालो पर लेजर-गाइडेड बमों से सटीक हमले कर युद्ध का रुख बदल दिया
। इसके अतिरिक्त २६ फरवरी २०१९ को बालाकोट में आतंकवादी शिविरों पर वायु सेना द्वारा किया गया ऐतिहासिक हवाई हमला भी कमान की अद्वितीय सामरिक क्षमता का प्रमाण है
।
४. आपदाओं में देवदूत और जनसेवा का संकल्प
वायु सेना के विमान केवल रक्षा अभियानों में ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी देशवासियों के लिए रक्षक बनकर उभरे हैं
। कमान ने ओडिशा सुपर चक्रवात (१९९९), भुज भूकंप (२००१), हिंद महासागर सुनामी (२००४), केदारनाथ की बाढ़ में ऑपरेशन राहत (२०१३), और श्रीनगर की बाढ़ में ऑपरेशन मेघराहत (२०१४) के दौरान लगातार राहत पहुँचाई है
।
प्रयागराज के निवासियों के लिए वायु सेना की उपस्थिति गर्व और सुरक्षा की भावना लाती है
। महाकुंभ २०२५ के दौरान, जिसमें ६६ करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने डुबकी लगाई, बामरौली के २9 विंग के एटीसी ने ३,६४८ निर्धारित और १,९०४ गैर-निर्धारित उड़ानों का सुरक्षित संचालन किया
। मध्य वायु कमान आज भी हमारे देश की संप्रभुता और सुरक्षित भविष्य की सबसे मजबूत गारंटी है
। जय हिंद!

