April 20, 2026

ओबरा में ‘सफेद झूठ’ और काली राख – विभागीय बेईमानी की भेंट चढ़ती रेणुका नदी

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ओबरा में ‘सफेद झूठ’ और काली राख – विभागीय बेईमानी की भेंट चढ़ती रेणुका नदी

रिपोर्ट मनोज सिंह राणा, सोनभद्र

ओबरा (सोनभद्र)। भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में सरकारी विभाग और अधिकारी जनहित के संरक्षक होते हैं, लेकिन ओबरा तापीय परियोजना के मामले में यह रक्षक ही ‘भक्षक’ की भूमिका में नजर आ रहे हैं। ‘सोन चेतना सामाजिक संगठन’ की शिकायतों और धरातल पर मौजूद साक्ष्यों के बावजूद, विभागीय अधिकारियों द्वारा किया जा रहा ‘सब ठीक है’ का दिखावा न केवल पद का दुरुपयोग है, बल्कि लाखों लोगों के जीवन के साथ किया जा रहा जघन्य अपराध है।
अधिकारियों की मिलीभगत या प्रशासनिक अक्षमता?
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की हालिया रिपोर्ट एक “लज्जाजनक दस्तावेज” है। एक तरफ विभाग स्वीकार करता है कि परियोजना द्वारा फ्लाई ऐश का निस्तारण नियमों के विरुद्ध है, वहीं दूसरी ओर बिना किसी सुधार या दंडात्मक कार्रवाई के शिकायत को ‘निस्तारित’ दिखा दिया जाता है। यह प्रत्यक्ष प्रमाण है कि विभाग में बैठे लोग अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय परियोजना के प्रबंधन को ‘कवर फायर’ (संरक्षण) दे रहे हैं।
मुख्य महाप्रबंधक (CGM) की बर्खास्तगी की मांग
संयंत्र के मुख्य महाप्रबंधक (CGM) और शीर्ष प्रबंधन पर यह सीधा आरोप है कि वे भ्रामक रिपोर्ट और झूठे आश्वासनों के सहारे लोकतंत्र के मूल्यों को कुचल रहे हैं। जब धरातल पर नदी दम तोड़ रही है, मछलियाँ मर रही हैं और किसानों की पीढ़ियों की मेहनत राख में मिल रही है, तब प्रबंधन का “मौन” रहना या “झूठ” बोलना उनकी अयोग्यता को दर्शाता है। ऐसे अधिकारियों को तत्काल पद से बर्खास्त किया जाना चाहिए, जो संवैधानिक प्रावधानों और पर्यावरण कानूनों को दरकिनार कर केवल ‘कॉरपोरेट हितों’ को साध रहे हैं।
जिम्मेदारी से भागता तंत्र
भारत सरकार के सेवा नियमों के अनुसार, यदि किसी अधिकारी के संज्ञान में कोई गंभीर अनियमितता आती है और वह उस पर कठोर कार्रवाई नहीं करता, तो वह भी उस अपराध का भागीदार है। ओबरा की रेणुका नदी में सीधे गिरती राख यह चीख-चीख कर कह रही है कि यहाँ ‘नियम’ नहीं, बल्कि ‘अधिकारियों की मनमानी’ चल रही है। शिकायत के बाद भी सैंपल न लेना और स्थलीय जांच की औपचारिकता करना इस प्रशासनिक गैर-जिम्मेदारी की पराकाष्ठा है।
अंतिम चेतावनी: अब जवाबदेही तय होगी
सोन चेतना सामाजिक संगठन यह स्पष्ट करता है कि विभाग की यह ‘कागजी बाजीगरी’ अब और नहीं चलेगी। यदि मुख्य महाप्रबंधक और संबंधित अधिकारियों ने धरातल पर स्थिति नहीं सुधारी और दोषियों पर मुकदमे दर्ज नहीं हुए, तो यह मामला केवल पत्राचार तक सीमित नहीं रहेगा। अब समय आ गया है कि इन “बेईमान” कुर्सियों को जनता की अदालत और माननीय न्यायालय के कटघरे में खड़ा किया जाए।

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