68 वर्षीय विधवा मां को छोड़ने के लिए इकलौते बेटे पर दबाव बनाना मानसिक क्रूरता -हाई कोर्ट

पति को तलाक लेने का अधिकार, पति की तलाक की अर्जी मंजूर
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि पत्नी द्वारा अपने पति पर बार-बार इस बात का दबाव बनाना कि वह अपनी 68 वर्षीय विधवा मां को छोड़कर अलग घर में रहे, मानसिक क्रूरता है। ऐसी स्थिति में पति हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक पाने का हकदार है।
न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने कहा, “अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में पहुंच चुकी अपीलकर्ता की मां को उसके बेटे के साथ से वंचित करने का प्रयास प्रतिवादी की ओर से किया गया क्रूर कृत्य है।”
पति और पत्नी का विवाह 17 फरवरी, 2000 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। उनकी दो बेटियां हैं। पति अपने माता-पिता का इकलौता बेटा है और उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में अपनी 68 वर्षीय विधवा मां के साथ रहता है। पति ने आरोप लगाया कि पत्नी लगातार उस पर दबाव बनाती है कि वह उसे लेकर उसके मायके इटावा चला जाए। उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी उसकी मां का अपमान करती थी और उनके साथ दुर्व्यवहार करती है।
पति के मुताबिक, विवाह की शुरुआत से ही पत्नी की मांग है कि वह अपनी मां से अलग होकर रहे। समय के साथ यह दबाव बढ़ता गया। उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी पुलिसकर्मी की बेटी होने का फायदा उठाते हुए उसे झूठे दहेज के मामलों में फंसाने की धमकी देती है।
आरोपों के अनुसार, 6 जुलाई, 2012 को पत्नी अपने गहने और स्त्रीधन लेकर मायके चली गई। इनमें पति की मां के गहने और 50,000 रुपये नकद भी शामिल थे। वह वापस नहीं लौटी और 3 मार्च, 2015 को उसने पति के साथ रहने से अंतिम रूप से इन्कार किया। इसके बाद पति ने मैनपुरी की फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 के तहत दांपत्य अधिकारों की बहाली और वैकल्पिक रूप से धारा 13 के तहत तलाक की मांग करते हुए अर्जी दायर की।
पत्नी ने न तो लिखित जवाब दाखिल किया और न ही कार्यवाही के किसी चरण में अदालत के सामने पेश हुई।
12 जुलाई, 2017 को मैनपुरी की फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज ने एकतरफा सुनवाई के बाद भी पति की अर्जी खारिज की और उस पर खर्च भी लगाया।
हाई कोर्ट ने कहा “हमारा मानना है कि ट्रायल कोर्ट ने वैवाहिक अर्जी को चोरी के आपराधिक मुकदमे की तरह चलाया और इस आधार पर क्रूरता के साक्ष्यों पर विश्वास नहीं किया कि गहने और नकदी ले जाने की कहानी साबित नहीं हो सकी।”
हाई कोर्ट ने माना कि पति-पत्नी के बीच चोरी जैसा आरोप लगाने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे उनके आपसी विश्वास को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में मानसिक क्रूरता का आधार केवल गहनों और नकदी से जुड़ा आरोप नहीं था। पति को अपनी बुजुर्ग विधवा मां को छोड़ने के लिए मजबूर करने का आरोप अलग से लगाया गया और वह साबित भी हुआ।
पति की अपील स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट का फैसला और डिक्री रद्द की तथा विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर दोनों का विवाह समाप्त कर दिया। इसके साथ ही दांपत्य अधिकारों की बहाली की वैकल्पिक मांग अप्रासंगिक हो गई। चूंकि स्थायी गुजारा भत्ता देने की मांग नहीं की गई, इसलिए हाई कोर्ट ने पत्नी के लिए हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 25 के तहत आवेदन करने का विकल्प खुला रखा है।

