मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणी से छिड़ी नई बहस: क्या समाज स्वीकार करेगा ‘हाउस हसबैंड’ का ढांचा? लिंग नहीं, जिम्मेदारी तय करे भूमिका: घरेलू श्रम के सम्मान और ‘हाउस हसबैंड’ की अवधारणा पर सामाजिक विमर्श
लिंग नहीं, जिम्मेदारी तय करे भूमिका: घरेलू श्रम के सम्मान और ‘हाउस हसबैंड’ की अवधारणा पर सामाजिक विमर्श

अदालत का ऐतिहासिक रुख: मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ ने एक पारिवारिक विवाद की सुनवाई के दौरान कहा कि यदि घर संभालने वाली महिला ‘हाउसवाइफ’ है, तो वही दायित्व निभाने वाले पुरुष को ‘हाउस हसबैंड’ कहने में कोई असंगति नहीं है।
अदृश्य श्रम का मूल्यांकन: घरेलू कार्यों—जैसे बच्चों की परवरिश, बुजुर्गों की देखभाल और गृह-प्रबंधन—को केवल “घर बैठना” न मानकर एक पूर्णकालिक और जिम्मेदारी भरे श्रम के रूप में रेखांकित किया गया।
बदलती सामाजिक संरचना: शिक्षा, शहरीकरण, पेशेवर महिलाओं की बढ़ती संख्या और ‘वर्क फ्रॉम होम’ जैसे विकल्पों ने पति-पत्नी के बीच पारंपरिक कार्य-विभाजन को लचीला बनाया है।
आय बनाम योगदान: परिवार में योगदान का मापदंड केवल बैंक खाते में आने वाला वेतन नहीं हो सकता; घरेलू प्रबंधन पारिवारिक स्थिरता का आधार है।
संस्कार और आने वाली पीढ़ी: माता-पिता के बीच घरेलू और आर्थिक दायित्वों का संतुलित बंटवारा बच्चों के मन से जेंडर-आधारित पूर्वाग्रहों को समाप्त करने में सहायक है।
जितेंद्र कुमार सिंहा /पटना/मदुरै/01 अक्टूबर 2026 :: पारिवारिक और सामाजिक संरचना में पारंपरिक जेंडर भूमिकाओं (Gender Roles) को लेकर एक बड़ा विमर्श सामने आया है। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै पीठ द्वारा वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में की गई मौखिक टिप्पणी ने देश में घरेलू श्रम के मूल्य और पुरुषों की पारिवारिक भूमिकाओं पर नई चर्चा को जन्म दे दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि परिवार और घर की व्यवस्था संभालने वाली महिला को ‘हाउसवाइफ’ कहा जा सकता है, तो समान परिस्थितियां निभाने वाले पुरुष के लिए ‘हाउस हसबैंड’ शब्द का प्रयोग पूरी तरह तर्कसंगत और स्वाभाविक है।
*शब्द से परे, श्रम के सम्मान की लड़ाई*
कानूनी और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि यह टिप्पणी महज दो शब्दों का तुलनात्मक अध्ययन नहीं है, बल्कि यह घरेलू श्रम को देखने के सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव का संकेत है। ऐतिहासिक रूप से, समाज में बाहर जाकर आय अर्जित करने वाले व्यक्ति को ही परिवार का मुख्य योगदानकर्ता माना जाता रहा है, जबकि बिना किसी तय वेतन अथवा छुट्टी के दिन-रात घर चलाने वाले व्यक्ति के श्रम को उपेक्षित या ‘अवैतनिक’ मानकर दरकिनार कर दिया जाता है।
गृह-प्रबंधन के अंतर्गत बच्चों का पालन-पोषण, भोजन व्यवस्था, बुजुर्गों का स्वास्थ्य और दैनिक आवश्यकताओं का समन्वय शामिल है। विशेषज्ञों के अनुसार, इन जिम्मेदारियों का कोई प्रत्यक्ष बाजार मूल्य भले तय न हो, लेकिन परिवार के अस्तित्व और सुचारु संचालन के लिए ये अनिवार्य हैं। ऐसे में यदि कोई पुरुष परिस्थितियों अथवा व्यक्तिगत पसंद के कारण यह भूमिका निभाता है, तो उसके योगदान को आर्थिक पैमानों पर आंकना या उसका उपहास उड़ाना अनुचित है।
*आधुनिक पारिवारिक मॉडल और लचीलापन*
बदलते दौर में शिक्षा, तकनीक और रोजगार के नए अवसरों ने पारिवारिक ताने-बाने को बदला है। आज कई परिवारों में महिला मुख्य आयोजक (Breadwinner) की भूमिका में है, जबकि पति घर का प्रबंधन देख रहे हैं। हाइब्रिड वर्क मॉडल और घर से काम करने की सुविधाओं ने भी भूमिकाओं की अदला-बदली को व्यावहारिक बनाया है।
भारतीय पारिवारिक मूल्यों का हवाला देते हुए सामाजिक विचारकों का कहना है कि संयुक्त या एकाकी परिवार व्यवस्था में सहयोग की भावना प्राथमिक रही है। घर के कामों को किसी एक लिंग की “बपौती” या “नियत कार्य” मानने के बजाय, इसे परिस्थितियों के अनुसार साझा करना ही वास्तविक समानता का रूप है।
*बाल मनोविज्ञान और सामाजिक संदेश*
पति-पत्नी के बीच जिम्मेदारियों का यह संतुलन अगली पीढ़ी के दृष्टिकोण को भी नया आकार दे रहा है। जब बच्चे पिता को रसोई संभालने, बच्चों के स्कूल का काम देखने और घर के प्रबंधन में सक्रिय देखते हैं, तो उनके भीतर घरेलू काम को “केवल महिलाओं का कार्य” मानने वाली रूढ़िवादी सोच समाप्त होती है। यह व्यवस्था बच्चों के सामने समानता और सह-अस्तित्व का एक व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत करती है।
संपादकीय दृष्टिकोण: पहचान नहीं, न्याय का विषय है ‘घरेलू श्रम’
मद्रास हाईकोर्ट की यह टिप्पणी भारतीय समाज के उस दोहरे रवैये पर सीधा प्रहार करती है जो काम का मूल्यांकन व्यक्ति के लिंग और उसकी आय के आधार पर करता है। हमारे समाज में पुरुषों का रोना, संवेदनशील होना या घर संभालना अक्सर असामान्य मान लिया जाता है, जबकि महिलाओं से स्वाभाविक रूप से यह अपेक्षा की जाती है कि वे करियर की कीमत पर भी घर संभालें।
’हाउस हसबैंड’ शब्द को स्वीकार करना पुरुष वर्ग पर कोई उपकार नहीं है, बल्कि यह उस श्रम की सामाजिक प्रतिष्ठा की पुनर्स्थापना है जो अब तक अदृश्य रहा है। असली मुद्दा यह नहीं है कि कौन बाहर जाकर कमा रहा है और कौन घर में खाना बना रहा है; असली मुद्दा यह है कि क्या हम एक-दूसरे के योगदान को बराबरी का सम्मान देने के लिए तैयार हैं?
परिवार कोई कॉर्पोरेट संस्था या प्रतियोगिता नहीं है जहाँ लाभ-हानि का खाता बनाकर श्रेष्ठता साबित की जाए। यह एक सह-यात्रा है, जहाँ भूमिकाएं परिस्थितिजन्य होती हैं। जब तक समाज कमाई को ही एकमात्र योग्यता का मापदंड मानता रहेगा, तब तक न तो ‘हाउसवाइफ’ को उसका पूरा अधिकार मिलेगा और न ही ‘हाउस हसबैंड’ को सामाजिक स्वीकृति। कोर्ट का यह बयान भाषा के दायरों को तोड़कर सोच को विस्तृत करने का एक सार्थक प्रयास है।

