बीजेपी की रेखा वर्मा के जन्मदिन पर मेरा विशेष लेख, रेखा वर्मा : गांव की राजनीति से राष्ट्रीय नेतृत्व तक का सफर
रेखा वर्मा : गांव की राजनीति से राष्ट्रीय नेतृत्व तक का सफर

लेखक : अखिलेश सिंह, पत्रकार, दिल्ली।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई ऐसे चेहरे उभरे हैं जिन्होंने गांव की चौपाल से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक अपनी अलग पहचान बनाई। उन्हीं नेताओं में एक नाम रेखा वर्मा का भी है। साधारण ग्रामीण परिवेश से निकलकर भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनने तक का उनका सफर भारतीय राजनीति में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और संघर्ष की मिसाल माना जाता है।
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के मोहम्मदी क्षेत्र के ब्लॉक पसगवां के ग्राम मकसूदपुर की निवासी रेखा वर्मा ने राजनीति की शुरुआत स्थानीय स्तर गांव से की। उन्होंने क्षेत्र पंचायत सदस्य का चुनाव जीतकर सार्वजनिक जीवन में कदम रखा। इसके बाद वह पसगवां ब्लॉक की प्रमुख चुनी गईं। ग्रामीण राजनीति में सक्रियता और संगठन क्षमता ने उन्हें क्षेत्र में तेजी से पहचान दिलाई।
रेखा वर्मा का राजनीतिक जीवन केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक बदलाव की तस्वीर भी है जिसमें ग्रामीण महिलाओं ने पंचायत स्तर से निकलकर राष्ट्रीय मंच तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। उन्होंने स्थानीय राजनीति में काम करते हुए महिलाओं, किसानों और ग्रामीण विकास से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।
रेखा वर्मा की शुरुआती राजनीतिक पृष्ठभूमि बहुजन समाज पार्टी से जुड़ी रही। उस दौर में उनके पति अरुण वर्मा भी बसपा की राजनीति में सक्रिय थे। बाद में बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच दोनों भारतीय जनता पार्टी के करीब आए। अरुण वर्मा भाजपा से वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में धौरहरा सीट से टिकट की दावेदारी कर रहे थे, लेकिन चुनाव से पहले उनका निधन हो गया।
अरुण वर्मा की मृत्यु के बाद भाजपा ने रेखा वर्मा पर भरोसा जताया और उन्हें धौरहरा लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया। यह फैसला उस समय राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना गया, क्योंकि भाजपा उत्तर प्रदेश में अपने विस्तार के निर्णायक दौर में थी। रेखा वर्मा ने पार्टी के विश्वास को सही साबित करते हुए 2014 का लोकसभा चुनाव जीत लिया।
2014 का चुनाव केवल उनकी व्यक्तिगत जीत नहीं थी, बल्कि यह भाजपा के लिए भी उत्तर प्रदेश में एक बड़े सामाजिक समीकरण का संकेत था।
ग्रामीण क्षेत्र से आने वाली महिला नेता के रूप में रेखा वर्मा ने संगठन और जनता के बीच मजबूत तालमेल स्थापित किया। संसद पहुंचने के बाद उन्होंने अपने क्षेत्र से जुड़े सड़क, बिजली, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।
2019 के लोकसभा चुनाव में रेखा वर्मा ने एक बार फिर धौरहरा सीट से जीत दर्ज की। लगातार दूसरी जीत ने यह साबित कर दिया कि उनकी राजनीतिक पकड़ केवल सहानुभूति लहर तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने क्षेत्र में अपना स्वतंत्र जनाधार तैयार कर लिया था। भाजपा संगठन में उनकी सक्रियता लगातार बढ़ती गई और उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदारियां मिलने लगीं।
रेखा वर्मा को भारतीय जनता पार्टी ने कई राज्यों के चुनावों में संगठनात्मक जिम्मेदारियां सौंपीं। चुनाव प्रबंधन, महिला मोर्चा के कार्यक्रमों और बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने में उनकी भूमिका को पार्टी नेतृत्व ने गंभीरता से लिया। यही कारण रहा कि उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया। वर्तमान में वह उत्तराखंड भाजपा की सह-प्रभारी के रूप में भी संगठनात्मक जिम्मेदारी निभा चुकी हैं।
भाजपा में रेखा वर्मा की पहचान एक ऐसी नेता की बनी, जो बिना आक्रामक बयानबाजी के संगठनात्मक काम पर अधिक ध्यान देती हैं। पार्टी के भीतर उन्हें मेहनती और अनुशासित नेता माना जाता है। उत्तर प्रदेश से लेकर दूसरे राज्यों तक चुनावी अभियानों में उनकी मौजूदगी भाजपा नेतृत्व के भरोसे को दर्शाती है।
हालांकि, राजनीति में उतार-चढ़ाव भी आते हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में रेखा वर्मा को हार का सामना करना पड़ा। यह हार केवल एक सीट का परिणाम नहीं थी, बल्कि उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों और स्थानीय समीकरणों का संकेत भी मानी गई। बावजूद इसके, भाजपा संगठन में उनकी सक्रियता और महत्व बना हुआ है। पार्टी नेतृत्व अब भी उन्हें अनुभवी महिला नेता के रूप में देखता है।
रेखा वर्मा की राजनीति में खास बात यह रही कि उन्होंने अपने ग्रामीण मूल को कभी नहीं छोड़ा। राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होने के बावजूद उनका जुड़ाव अपने क्षेत्र से बना रहा। लखीमपुर खीरी के ग्रामीण इलाकों में आज भी उन्हें स्थानीय नेता के रूप में याद किया जाता है। वह उस पर खरी नजर भी आती हैं। ग्रामीण इलाकों में शादी समारोह से लेकर सामाजिक कार्यक्रम में सक्रिय नजर आती हैं। आमजन के दुखसुख में हर समय मौजूद रहती हैं।
महिला नेतृत्व की दृष्टि से भी रेखा वर्मा का सफर महत्वपूर्ण माना जा सकता है। भारतीय राजनीति लंबे समय तक पुरुष प्रधान रही है, लेकिन पंचायतों से लेकर संसद तक महिलाओं की बढ़ती भागीदारी ने तस्वीर बदली है। रेखा वर्मा इसी बदलाव की एक प्रमुख उदाहरण हैं। उन्होंने यह साबित किया कि स्थानीय राजनीति से निकली महिला भी राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी भूमिका निभा सकती है।
रेखा वर्मा का राजनीतिक सफर संघर्ष, संगठन और अवसर का है। या फिर तीनों का मिश्रण है। बसपा से भाजपा तक की यात्रा, पति की असमय मृत्यु के बाद चुनावी मैदान में उतरना, लगातार दो बार सांसद बनना और फिर राष्ट्रीय नेतृत्व में जगह बनाना, यह सब उन्हें उत्तर प्रदेश की महत्वपूर्ण महिला नेताओं की श्रेणी में खड़ा करता है।
भारतीय जनता पार्टी में महिलाओं की बढ़ती भूमिका को समझने के लिए भी रेखा वर्मा का राजनीतिक जीवन एक महत्वपूर्ण अध्ययन माना जा सकता है। वह उन नेताओं में शामिल हैं। जिन्होंने जमीनी राजनीति को संगठनात्मक राजनीति से जोड़कर अपनी पहचान बनाई।
अब आने वाले समय में उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका किस रूप में सामने आएगी। यह राजनीतिक परिस्थितियां तय करेंगी, लेकिन इतना निश्चित है कि रेखा वर्मा ने अपने संघर्ष और सक्रियता से भारतीय राजनीति में एक स्थायी पहचान बना ली है।

