स्मार्ट मीटर को लेकर चल रही कवायद अब नए फेज में स्मार्ट मीटर को लेकर चल रही कवायद अब नए फेज में पहुंच गई गई
स्मार्ट मीटर को लेकर चल रही कवायद अब नए फेज में पहुंच गई

केंद्र की नई गाइडलाइन में प्रीपेड के साथ पोस्टपेड ऑप्शन देने की बात कही गई है, लेकिन ग्राउंड पर अभी भी कन्फ्यूजन साफ नजर आ रहा है.
शहर में तेजी से पुराने मीटर हटाकर स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाए जा रहे हैं, जिससे यूजर्स की संख्या बढ़ रही है. हालांकि बड़ी संख्या में लोग अभी भी पुराने सिस्टम पर हैं. एडवांस पेमेंट, बिलिंग क्लैरिटी और ऑप्शन न मिलने की शिकायतों के बीच यह बदलाव लोगों के लिए सुविधा से ज्यादा टेंशन बनता दिख रहा है.
कितना मीटर लगा और कितना बाकी
प्रयागराज के अर्बन एरिया में करीब 3 लाख बिजली कंज्यूमर्स हैं, जिनमें लगभग 80 प्रतिशत घरेलू और 20 प्रतिशत कमर्शियल कनेक्शन हैं. अब तक करीब 52 हजार यूजर्स के पुराने मीटर बदलकर स्मार्ट प्रीपेड मीटर इंस्टॉल किए जा चुके हैं. यानी अभी भी करीब 2.48 लाख लोग पुराने पोस्टपेड सिस्टम पर डिपेंड हैं. इसका मतलब साफ है कि काम तेजी से चल रहा है, लेकिन पूरा सिस्टम अभी लागू नहीं हुआ है. इसी गैप के बीच सबसे ज्यादा कन्फ्यूजन और शिकायतें सामने आ रही हैं, क्योंकि कुछ लोग नए सिस्टम में आ गए हैं और बाकी पुराने पर ही चल रहे हैं.
कागज और रियलिटी में बड़ा अंतर
नई गाइडलाइन के अनुसार अब स्मार्ट मीटर को सिर्फ प्रीपेड मोड में रखना जरूरी नहीं है और यूजर्स को प्रीपेड या पोस्टपेड का ऑप्शन मिलना चाहिए. लेकिन ग्राउंड पर कई जगह ऐसा नहीं दिख रहा. मीटर इंस्टॉलेशन पहले की तरह ही हो रहा है और लोगों को सीधे प्रीपेड सिस्टम में शिफ्ट किया जा रहा है. इससे लोगों को लग रहा है कि नियम सिर्फ पेपर तक सीमित हैं. जब पॉलिसी और ग्राउंड रियलिटी में गैप होता है, तो कन्फ्यूजन बढ़ता है और अभी यही सिचुएशन शहर में देखने को मिल रही है.
बिलिंग सिस्टम बना सिरदर्द
प्रीपेड सिस्टम में यूजर्स को पहले से रिचार्ज करना पड़ता है, जिससे कई घरों का बजट गड़बड़ा रहा है. पहले महीने के आखिर में बिल भरने की सुविधा थी, लेकिन अब पहले ही पैसा डालना पड़ता है. इससे हर समय बैलेंस की टेंशन बनी रहती है. यह सिस्टम काफी हद तक मोबाइल रिचार्ज जैसा हो गया है, जहां बिजली भी पहले खरीदनी पड़ती है. खासकर मिडिल क्लास और फिक्स इनकम वाले परिवारों के लिए यह बड़ा चेंज है, जिसे एडजस्ट करना आसान नहीं लग रहा और इसी वजह से शिकायतें बढ़ रही हैं.
डेटा समझना भी आसान नहीं
स्मार्ट मीटर में रोजाना के हिसाब से बैलेंस कटता है, लेकिन इसे समझना हर यूजर के लिए आसान नहीं है. ऐप और मैसेज के जरिए अपडेट मिलते हैं, लेकिन वह इतने क्लियर नहीं होते कि हर कोई आसानी से समझ सके. पहले बिल में यूनिट और चार्ज साफ दिखते थे, जिससे तुलना आसान होती थी. अब पूरा सिस्टम डिजिटल और थोड़ा कॉम्प्लेक्स हो गया है. इससे लोगों को समझ नहीं आ रहा कि पैसा कैसे और किस बेसिस पर कट रहा है, जिससे सिस्टम पर ट्रस्ट भी थोड़ा कमजोर पड़ रहा है.
कंसेंट और प्रोसेस पर भी उठ रहे सवाल
कई इलाकों में यह भी देखने को मिल रहा है कि मीटर बदलते समय यूजर्स की कंसेंट को लेकर सवाल उठ रहे हैं. लोगों का कहना है कि कई बार बिना पूरी जानकारी दिए मीटर बदल दिया जाता है. हालांकि बिजली विभाग का कहना है कि पूरी प्रोसेस ट्रांसपेरेंट तरीके से की जा रही है. लेकिन ग्राउंड फीडबैक कुछ और ही कहानी बता रहा है. लोगों को सही जानकारी और क्लैरिटी नहीं मिल रही, जिससे असहजता बनी हुई है और यही इस पूरे मुद्दे को और सेंसिटिव बना रहा है.
सुविधा या कन्फ्यूजन, जवाब अभी बाकी
स्मार्ट मीटर को मॉडर्न और ट्रांसपेरेंट सिस्टम के तौर पर पेश किया जा रहा है, लेकिन यूजर्स का एक्सपीरियंस अभी मिक्स्ड है. रियल टाइम डेटा और कंट्रोल जैसी सुविधाएं जरूर हैं, लेकिन उनका फायदा तभी है जब लोग सिस्टम को समझ सकें. फिलहाल सीन यह है कि सुविधा से ज्यादा कन्फ्यूजन दिख रहा है. अगर आगे चलकर ऑप्शन, अवेयरनेस और सपोर्ट सिस्टम बेहतर नहीं हुआ, तो यह बदलाव लोगों के लिए और मुश्किल खड़ा कर सकता है.
भाग का दावा, टेक्नोलॉजी से होगा कंट्रोल आसान
हालांकि विभाग का कहना है कि स्मार्ट मीटर सिस्टम को इस तरह डिजाइन किया गया है कि उपभोक्ताओं को ज्यादा सुविधा मिल सके. 5 किलोवाट तक के कनेक्शन पर सिंगल फेज और उससे ऊपर थ्री फेज मीटर लगाए जा रहे हैं, जबकि इंडस्ट्री के लिए अलग कैटेगरी तय की गई है. विभाग के अनुसार उपभोक्ता अपने मोबाइल पर ही यूनिट कंजम्पशन और बैलेंस की जानकारी देख सकते हैं, जिससे खर्च पर बेहतर कंट्रोल रहेगा. साथ ही ऑनलाइन रिचार्ज की सुविधा दी गई है और जिन लोगों को इसमें दिक्कत होती है, उनके लिए बिजली विभाग के काउंटर पर भी रिचार्ज का ऑप्शन उपलब्ध कराया गया है.
स्मार्ट मीटर का आइडिया तो ठीक लग रहा है, लेकिन प्रैक्टिकल में काफी कन्फ्यूजन है. हमें कोई ऑप्शन नहीं मिला, सीधे प्रीपेड कर दिया गया. ऊपर से हर समय बैलेंस की टेंशन रहती है, ये सिस्टम अभी लोगों के हिसाब से सेट नहीं हुआ है.
आदर्श पांडेय
पहले बिल आता था तो एक बार में पेमेंट कर देते थे, अब बार-बार रिचार्ज करना पड़ रहा है. समझ भी नहीं आता पैसा कैसे कट रहा है. ऐप है, मैसेज आते हैं, लेकिन क्लियर नहीं होता, इसलिए भरोसा थोड़ा कम लग रहा है सिस्टम पर.
सैफ हुसैन
सरकार कह रही है ऑप्शन मिलेगा, लेकिन ग्राउंड पर ऐसा कुछ दिख नहीं रहा. हमारे यहां तो बिना पूछे मीटर बदल दिया गया. अगर पोस्टपेड का ऑप्शन है तो लोगों को सही से बताया क्यों नहीं जा रहा, यही सबसे बड़ा सवाल है.
अवनीश यादव
मिडिल क्लास के लिए ये सिस्टम थोड़ा मुश्किल है क्योंकि पहले से पैसा डालना पड़ता है. महीने का बजट गड़बड़ा जाता है. अगर बैलेंस खत्म हो गया तो तुरंत दिक्कत होती है, इसलिए ये सुविधा कम और टेंशन ज्यादा लग रही है.
एमडी कलाम
टेक्नोलॉजी अच्छी चीज है, लेकिन जब तक आम आदमी उसे आसानी से समझ न पाए, तब तक उसका फायदा नहीं मिलता. स्मार्ट मीटर में डेटा तो मिल रहा है, लेकिन इतना कॉम्प्लेक्स है कि हर कोई उसे सही से समझ नहीं पा रहा है.
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