पंचायतों की ‘तालाबंदी’ के खिलाफ प्रधानों का हल्लाबोल

सीएम को भेजा अल्टीमेटम!प्रशासक नियुक्ति की आहट से भड़का प्रधान संघ

शंकरगढ़ के ‘शेरों’ ने भरी हुंकार— “हक छीना तो ठप कर देंगे प्रदेश का विकास”
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की आहट और प्रशासकों की संभावित नियुक्ति को लेकर ग्रामीण राजनीति का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया है। आज जनपद के विकास खंड शंकरगढ़ के प्रधान संघ ने प्रदेश सरकार के खिलाफ बगावती तेवर अख्तियार करते हुए आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। सोमवार को संघ के अध्यक्ष पुष्यराज सिंह (एडवोकेट) की अगुवाई में खंड विकास अधिकारी शंकरगढ़ को ज्ञापन सौंपा गया। मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र ने लखनऊ तक खलबली मचा दी है। *लोकतंत्र की ‘जड़’ पर प्रहार बर्दाश्त नहीं* प्रधान संघ ने साफ शब्दों में कहा है कि ग्राम पंचायतें भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला हैं। जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को दरकिनार कर सरकारी ‘प्रशासकों’ को सत्ता सौंपना लोकतंत्र की हत्या है। अध्यक्ष पुष्यराज सिंह ने दो-टूक कहा, “प्रधान जनता का सेवक है, किसी बाबू का मातहत नहीं।” *’प्रशासक राज’ यानी विकास का विनाश* महामंत्री दिनेश कुमार मिश्र ने आरोप लगाया कि जब भी पंचायतों में प्रशासक नियुक्त होते हैं, गांव का विकास फाइलों में दफन हो जाता है। भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है और जनता की सुनवाई बंद हो जाती है। संघ ने मांग की है कि किसी भी स्थिति में प्रशासक न बैठाए जाएं। *अन्य राज्यों की तर्ज पर मिले ‘पावर’* बैठक में मांग उठी कि अन्य विकसित राज्यों की तरह उत्तर प्रदेश में भी पंचायतों को पूर्ण वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार दिए जाएं। सरकार ऐसी नीति बनाए जिससे पंचायतें स्वायत्त (Autonomous) बन सकें और किसी के हस्तक्षेप के बिना काम कर सकें। *महिला प्रतिनिधियों ने दिखाई ताकत* इस मुहिम में महिला प्रधानों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। संरक्षक नीलम सिंह और उपाध्यक्ष विजयलक्ष्मी ने कहा कि आधी आबादी के प्रतिनिधित्व को प्रशासक राज के जरिए कमजोर करने की कोशिश की जा रही है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। *समय पर चुनाव ही एकमात्र समाधान* कोषाध्यक्ष शैलेन्द्र सिंह और उपाध्यक्ष पृथ्वी राज साहू ने मांग की कि चुनाव संविधान की समय सीमा के भीतर कराए जाएं। चुनावों में अनावश्यक देरी सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करती है। . *संगठन की एकजुटता ने चौंकाया* शंकरगढ़ प्रधान संघ की इस एकजुटता में मूलचन्द्र, आशा सिंह, गुलाब सिंह और मीडिया प्रभारी की सक्रियता ने शासन को सोचने पर मजबूर कर दिया है। कार्यकारिणी सदस्य श्यामबाबू यादव, अनारकली और सूरज सिंह समेत दर्जनों प्रधानों ने एक सुर में ‘अधिकार नहीं तो चैन नहीं’ का नारा बुलंद किया। *सोशल मीडिया से सड़कों तक संग्राम* प्रधान संघ ने चेतावनी दी है कि यह पत्र सिर्फ एक शुरुआत है। यदि समय रहते सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया, तो विकास खंड कार्यालय से लेकर जिलाधिकारी कार्यालय और फिर विधानसभा घेराव की रणनीति तैयार है। *’धमाकेदार’ चेतावनी: आंदोलन का आगाज़* संगठन के प्रकाशन मंत्री और कार्यकारिणी सदस्यों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे लोकतांत्रिक तरीके से व्यापक आंदोलन के लिए बाध्य होंगे। इस बार प्रधान झुकने के मूड में नहीं हैं। “हम अपनी गरिमा और ग्राम पंचायत की स्वायत्तता के लिए अंतिम सांस तक लड़ेंगे। अगर सरकार ने हमें कमजोर समझा तो ईंट से ईंट बजा देंगे।” — पुष्यराज सिंह (एडवोकेट), अध्यक्ष प्रधान संघ *मुख्य मांगें एक नजर में* समयबद्ध चुनाव: संविधान के तहत तय वक्त पर ही हों पंचायत चुनाव। नो प्रशासक पॉलिसी: किसी भी स्थिति में ग्राम प्रधानों के अधिकार अधिकारियों को न दिए जाएं। वित्तीय आजादी: ग्राम पंचायतों के बजट पर सिर्फ जनता के प्रतिनिधियों का हक हो। स्पष्ट नीति: प्रतिनिधियों के मान-सम्मान और सुरक्षा के लिए सख्त कानून बने।

