July 21, 2024

ब्रम्हलीन जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती पर रामभद्राचार्य की टिप्पणी से भड़के अग्नि अखाड़ा के महामण्डलेश्वर

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ब्रम्हलीन जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती पर रामभद्राचार्य की टिप्पणी से भड़के अग्नि अखाड़ा के महामण्डलेश्वर

सिवनी । रामभद्राचार्य महाराज के द्वारा सिवनी में रामकथा के दौरान ब्रम्हलीन जगतगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज के बारे में कही गई बात अब तूल पकड़ते दिख रही है। इस संबंध में ग्निपीठाधीश्वर आचार्य महामण्डलेश्वर ब्रम्हर्षि आचार्य महामण्डलेश्वर श्रीमद् रामकृष्णानंद महाराज अमरकंटक अग्नि अखाड़ा के द्वारा निंदा की गई है।
श्री रामभद्राचार्य के द्वारा सिवनी के पॉलिटेक्निक ग्राउंड में आयोजित रामकथा में विगत दिनों ब्रम्हलीन ज्योतिष पीठाधीश्वर एवं द्वारका शारदा पीठाधीश्वर ब्रम्हलीन जगद्गुरू शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती महाराज को व्यवहार से कांग्रेसी आपके द्वारा कहा गया था। उनके इस वक्तव्य की निंदा अग्निपीठाधीश्वर आचार्य महामण्डलेश्वर ब्रम्हर्षि आचार्य महामण्डलेश्वर श्रीमद् रामकृष्णानंद महाराज अमरकंटक अग्नि अखाड़ा के द्वारा की गई है।
उन्होंने कहा कि परमपूज्य जगदगुरू महाराज स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उन्होंने भारत को स्वतंत्र कराने के लिए आजादी की लड़ाई में भाग लेकर कठोर कारावास की सजा भोगी जिसके अंतर्गत वह उत्तरप्रदेश के बनारस के इचवल जेल में 6 माह का कारावास तथा मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले की जेल में 5 माह का कारावास भोगा।
आचार्य महामण्डलेश्वर ने कहा कि दिल्ली के दशहरा मैदान में आयोजित रामसेतु की रक्षा हेतु विराट धर्मसभा आयोजित की गई। उस समय हमारे देश में कांग्रेस की सरकार थी तथा भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह थे। यदि शंकराचार्य कांग्रेसी होते तो मनमोहन सरकार का विरोध क्यों करते? दिल्ली के जंतर-मंतर मैदान में गंगा की अविरल निर्मल धारा की रक्षा हेतु जो आंदोलन किया उस समय प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री उमा भारती तथा छत्तीसगढ़ सरकार के वर्तमान भाजपा सरकार के मंत्री ब्रजमोहन अग्रवाल भी उपस्थित थे। यद्यपि शिष्य की हैसियत से इस सभा में राज्यसभा सांसद दिग्विजयसिंह भी उपस्थित रहे, यदि शंकराचार्य कांग्रेसी होते तो उस समय भी मनमोहनसिंह सरकार का विरोध क्यों करते? देश में स्वतंत्रता आंदोलन के समय केवल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ही थी जो देश को आजाद कराने के लिए स्वतंत्रता आंदोलन में भाग ले रही थी। उस समय सभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कांग्रेसी ही थे। रामराज्य परिषद का गठन धर्मसम्राट करपात्री महाराज ने किया था जिसके संस्थापक आप ही थे तथा ब्रम्हलीन जगद्गुरू शंकराचार्य महाराज रामराज्य परिषद के अध्यक्ष थे। रामराज्य परिषद कांग्रेस के विरोध में गठित की गई थी। गौरक्षा आंदोलन जब दिल्ली में आयोजित किया गया था जिसमें करपात्री महाराज तथा ब्रम्हलीन जगद्गुरू शंकराचार्य महाराज और गोवर्धन पीठ के तत्कालीन शंकराचार्य निरंजन देव तीर्थ भी उपस्थित थे। इस आंदोलन के समय भी कांग्रेस की सरकार थी तथा भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी थी। सन् 1986 में राम मंदिर का ताला तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने ब्रम्हलीन जगदगुरू शंकराचार्य के कहने पर खोला था। हिन्दुओं का पंजाब से पलायन रोकने के लिये दिल्ली से लेकर पंजाब तक पैदल मार्च निकालने की घोषणा की गई, उस समय भी कांग्रेस की सरकार थी तथा उस समय भारत के प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी थे। ब्रम्हलीन जगदगुरू शंकराचार्य के द्वारा राममंदिर निर्माण के लिए सन 1989 में हुए शिलान्यास का विरोध इसलिए किया गया क्योंकि यह शिलान्यास गर्भग्रह से 192 फिट दूर हो रहा था। इसका विरोध करने से क्या वे कांग्रेसी हो गये?
जब देश के अंदर हर-हर मोदी का नारा लगा रहे थे तब ब्रम्हलीन जगदगुरू शंकराचार्य के द्वारा हर-हर मोदी का उन्होंने विरोध किया क्योंकि हर-हर भगवान शिव के लिए है तो क्या इससे वह कांग्रेसी हो गये? सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राममंदिर का शिलान्यास गलत मुर्हूत में किया गया, उसका उनके द्वारा विरोध किया गया तो क्या वह गलत नहीं था? हम बता देना चाहते हैं कि राजकोट के चार्तुमास में शंकराचार्य के पास जब स्वामी रामभद्राचार्य पधारे थे तब हमारी भेंट हुई थी। हमने उन्हें देखा था कि उन्होंने श्वेत वस्त्र धारण किये हुए थे, उन्हें उस समय प्रज्ञाचक्षु गिरधर मिश्र के नाम से जानते थे। उन्होंने हमें दो पुस्तकें भेंट की थी। पहली पुस्तक का नाम मानस में तापस प्रसंग तथा दूसरी पुस्तक सविधि भरत सराहन जोगू। गिरधर मिश्रा से आप जगदगुरू रामभद्राचार्य बन गये। आपने कहा कि शंकराचार्य जैसे पद पर विराजमान रहते हुए स्वामी स्वरूपानंद ने कभी भी अपनी धर्मसभा में किसी भी राजनैतिक दल का समर्थन नहीं किया परंतु आप सिंहासन में विराजमान होकर देश के सर्वाेच्च सर्वमान्य शंकराचार्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानी द्विपीठाधीश्वर ब्रम्हलीन शंकराचार्य के लिए इस प्रकार की टिप्पणी करना उचित नहीं है और आप स्वयं सिहांसन में विराजमन होकर एक दल विशेष तथा व्यक्ति विशेष का प्रचार कर रहे हैं जो उचित नहीं है। यह भूमि जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की जन्मभूमि है जिनका जन्म गुरूधाम में हुआ है। आपके द्वारा जिस व्यक्ति का प्रचार प्रसार किया जा रहा है वह शंकराचार्य की जन्मभूमि गुरूधाम के ट्रस्ट का ट्रस्टी भी है। शंकराचार्य के दरबार में उन्हें पर्याप्त सम्मान दिया गया। अपने वक्तव्य में बताया कि शंकराचार्य नरेंद्र मोदी को गरियाते थे। हम उन्हें यह बता देना चाहते हैं कि भले ही शंकराचार्य और मोदी के सिद्धांतो में मतभेद रहा हो परंतु आज तक सामान्य व्यक्ति को अपशब्द नहीं कहा। जहां तक पार्टी की बात है वह किसी भी राजनीतिक दल के समर्थक नहीं थे। हमें उनके वीडियो के माध्यम से वक्तव्य सुनकर उनकी विद्धता पर तरास आता है। एक विद्वान सन्यासी देश के सर्वमान्य शंकराचार्य जिनकी दुनिया में निराली छवि थी ऐसे शंकराचार्य के विषय में हल्की बात को कहना उनकी किस बुद्धि की ओर इशारा करता है।

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