January 17, 2026

घोषणाओं की रोशनी, हकीकत का अंधेरा पांगी: विकास नहीं, सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गई जनजातीय घाटी

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घोषणाओं की रोशनी, हकीकत का अंधेरा पांगी: विकास नहीं, सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गई जनजातीय घाटी

रिपोर्ट अशोक कुमार, ब्यूरो चम्बा

चम्बा। जिला चंबा की दुर्गम जनजातीय पांगी घाटी एक बार फिर यह सवाल पूछने को मजबूर है कि क्या यह क्षेत्र सरकारों के लिए सिर्फ चुनावी मंच और वोट बैंक भर है?
मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों तक मंचों से घोषणाएं होती हैं, लेकिन ज़मीन पर आते-आते वही घोषणाएं फाइलों, नियमों और विभागीय जिद में दम तोड़ देती हैं।
थिर्योट–किलाड़ 33 केवी विद्युत लाइन इसका ताज़ा और सबसे बड़ा उदाहरण है। वर्षों से बिजली संकट झेल रहे पांगीवासियों को 15 अप्रैल को मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू की घोषणा से उम्मीद बंधी थी कि अब घाटी स्थायी बिजली व्यवस्था की ओर बढ़ेगी।
लेकिन हकीकत यह है कि नौ महीने बीत चुके हैं और पांगी आज भी अंधेरे में खड़ी है।
विकास या वोट बैंक?
शौर तक लाइन डाल दी जाती है, कोई आपत्ति नहीं।
शौर से आगे काम शुरू होते ही वन विभाग FCA का हवाला देकर काम रुकवा देता है।
विद्युत बोर्ड कहता है FCA जरूरी नहीं।
वन विभाग कहता है नियमों के बिना काम नहीं होगा।
सवाल सीधा है—
अगर नियम थे, तो घोषणा से पहले क्लीयरेंस क्यों नहीं ली गई?
और अगर नियम नहीं थे, तो पांगी के हिस्से में ही लालफीताशाही क्यों आई?
यह पहली बार नहीं है।
पांगी में सड़कें हों, बिजली हो, स्वास्थ्य सेवाएं हों या संचार व्यवस्था—
हर चुनाव से पहले वादे, हर चुनाव के बाद बहाने।
जनजातीय क्षेत्र होना क्या अपराध है?
राज्य के मैदानी इलाकों में योजनाएं तेज़ी से पूरी होती हैं, लेकिन जैसे ही मामला पांगी जैसे दुर्गम जनजातीय क्षेत्र का आता है,
विकास सबसे पहले “नियमों” की बलि चढ़ता है।
यहां सवाल किसी एक विभाग का नहीं,
यह पूरे सिस्टम की मानसिकता पर सवाल है
जिसमें पांगी को अब भी
“कम आबादी, दूरस्थ क्षेत्र, चुनाव के समय याद आने वाली घाटी”
के तौर पर देखा जाता है।
निष्पक्ष सवाल, जवाबदेही की मांग
अगर FCA जरूरी थी, तो
➡️ विद्युत बोर्ड की लापरवाही पर कार्रवाई क्यों नहीं?
अगर FCA जरूरी नहीं थी, तो
➡️ वन विभाग ने जनहित के काम को क्यों रोका?
और सबसे अहम—
➡️ क्या मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद भी जिम्मेदारी तय नहीं होगी?
पांगी अब सवाल पूछ रही है
पांगी घाटी आज यह नहीं कह रही कि कानून तोड़े जाएं,
पांगी सिर्फ यह पूछ रही है कि
कानून सिर्फ उसी के रास्ते में क्यों खड़े किए जाते हैं?
सरकार को यह तय करना होगा कि
पांगी सिर्फ चुनावी नक्शे में है या विकास के रोडमैप में भी।
क्योंकि
अगर घोषणाएं ही विकास होतीं,
तो आज पांगी अंधेरे में नहीं होती।
अब समय है जवाब देने का,
क्योंकि पांगी अब सिर्फ भरोसा नहीं,
हिसाब मांग रही है।

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