January 17, 2026

तलाशी–जब्ती की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य, डीजीपी को एसओपी बनाने का निर्देश

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तलाशी–जब्ती की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य, डीजीपी को एसओपी बनाने का निर्देश


प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रदेश में अपराध विवेचना को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के लिए यूपी पुलिस को चुस्त-दुरुस्त करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा है कि तलाशी और जब्ती की प्रक्रिया बीएनएसएस की धारा 105 के अनुरूप ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग के साथ की जाए। इस निर्देश का पालन न करने पर संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
बाइक चोरी के एक मामले में आरोपित मुजफ्फरनगर निवासी शादाब की जमानत अर्जी स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को निर्देश दिया है कि इस संबंध में विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की जाए।
कोर्ट ने पाया कि प्रकरण में पुलिस द्वारा मोटरसाइकिलों की जब्ती के समय वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की गई थी, जिससे जांच की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न हुआ। कोर्ट ने कहा कि तलाशी और जब्ती की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग से एक ओर निर्दोष लोगों को झूठे आरोपों से बचाया जा सकेगा, वहीं दूसरी ओर अपराधियों को सजा दिलाने में भी मदद मिलेगी। यह रिकॉर्डिंग जमानत और ट्रायल दोनों चरणों में सहायक होगी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बीएनएसएस की धारा 105 का उद्देश्य पुलिस द्वारा गलत तरीके से साक्ष्य तैयार करने की संभावना को रोकना और निष्पक्ष जांच के लिए विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध कराना है। यूपी बीएनएसएस रूल्स, 2023 के नियम 18 के साथ धारा 105 का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि तलाशी या जब्ती की वीडियो रिकॉर्डिंग को केस डायरी का हिस्सा बनाया जाना चाहिए और 48 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट को भेजा जाना अनिवार्य है।
पीठ ने यह भी कहा कि डीजीपी की ओर से 21 जुलाई 2025 को रिकॉर्डिंग की अनिवार्यता को लेकर सर्कुलर जारी किया गया था, लेकिन नियम 18(5) के तहत नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के साथ मिलकर विस्तृत एसओपी अभी तक जारी नहीं की गई है। कोर्ट ने चिंता जताई कि उसके समक्ष कई ऐसे मामले आए हैं, जहां रिकवरी के समय न तो कोई स्वतंत्र गवाह मौजूद था और न ही ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग की गई।
निर्दोष व्यक्तियों को झूठे मामलों में फंसाए जाने से बचाने, जांच को मजबूत बनाने और जमानत अर्जियों की सुनवाई में टिकाऊ साक्ष्य उपलब्ध कराने के लिए इन निर्देशों का कड़ाई से पालन आवश्यक बताया गया।
जेलों में भीड़भाड़ और सह-आरोपितों को पहले ही जमानत मिल जाने के आधार पर कोर्ट ने शादाब की जमानत अर्जी मंजूर कर ली। मामले के अनुसार आरोपित का नाम एफआईआर में नहीं था और छह मामलों में गिरफ्तारी के बाद उसका नाम दर्ज किया गया। सह-आरोपित सोहेब और ओवैस को पहले ही जमानत मिल चुकी है। आरोपित 16 अप्रैल 2025 से जेल में बंद था। आरोपितों के खिलाफ थाना मंसूरपुर में बीएनएस की धारा 305(2) और 317(2) के तहत मुकदमा दर्ज है।

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