January 25, 2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट में 50% न्यायाधीशों के पद अब भी खाली; छह महीने से जवाब न देने पर कोर्ट ने केंद्र और हाईकोर्ट प्रशासन पर नाराजगी जताई

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इलाहाबाद हाईकोर्ट में 50% न्यायाधीशों के पद अब भी खाली; छह महीने से जवाब न देने पर कोर्ट ने केंद्र और हाईकोर्ट प्रशासन पर नाराजगी जताई

उत्तर प्रदेश में न्यायिक तंत्र की चरमराती हालत पर दाखिल एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान, इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ—न्यायमूर्ति वी.के. बिड़ला और न्यायमूर्ति जितेन्द्र कुमार सिन्हा,ने इस बात पर नाराज़गी जताई कि मामला बीते छह महीने से लंबित है, कई बार सूचीबद्ध हो चुका है, फिर भी आज तक कोई स्पष्ट निर्देश या जवाब दाखिल नहीं किया गया है।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस.एफ.ए. नक़वी और अधिवक्ता शाश्वत आनंद ने अदालत के समक्ष तर्क रखते हुए बताया कि यह केवल प्रशासनिक असावधानी नहीं, संवैधानिक उत्तरदायित्व की खुली अवहेलना है।

पीठ ने केंद्र, राज्य सरकार और हाईकोर्ट प्रशासन के अधिवक्ताओं को निर्देश दिया कि वे अगली सुनवाई, 1 सितंबर 2025, से पहले अनिवार्य रूप से आवश्यक निर्देश प्राप्त करें और अदालत को सूचित करें। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि “इतने गंभीर संवैधानिक मुद्दे पर भी जब कोई जवाब न आए, तो यह संस्थागत संवेदनहीनता का संकेत है।”

इस याचिका का मूल प्रश्न बेहद गंभीर है: इलाहाबाद हाईकोर्ट, जो देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की 24 करोड़ जनता को न्याय देने की जिम्मेदारी निभाता है, आज मात्र 80 न्यायाधीशों के बल पर काम कर रहा है, जबकि इसकी स्वीकृत संख्या 160 है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि वर्तमान में 11.5 लाख से अधिक मामले हाईकोर्ट में लंबित हैं। ऐसे में याचिका में उठाया गया सवाल सीधा और बुनियादी है:

“जब आधे पद खाली हैं और न्यायाधीश ही नहीं हैं, तो फिर न्याय कैसे मिलेगा?”

याचिका में यह भी कहा गया है कि केवल रिक्तियों को भरना पर्याप्त नहीं, बल्कि राज्य की जनसंख्या और न्यायिक बोझ के अनुपात में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या में तत्काल और संरचनात्मक वृद्धि की आवश्यकता है।

याचिका संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत “समय पर और प्रभावी न्याय” को मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित करती है, और सुप्रीम कोर्ट के तमिलनाडु राज्यपाल संबंधी हालिया निर्णय का हवाला देते हुए यह स्पष्ट करती है कि संवैधानिक पदाधिकारियों को भी जवाबदेह बनाया जा सकता है, जब उनकी निष्क्रियता से कानून का शासन खतरे में पड़ता है।

अब यह मामला 1 सितंबर 2025 को फिर से सुना जाएगा। कोर्ट की बढ़ती नाराज़गी और जनता के अधिकारों पर मंडराते खतरे के बीच, बड़ा सवाल यह है—क्या अब भी सिस्टम जागेगा, या फिर न्याय की प्रतीक्षा और लंबी होगी?

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