दस्तावेज़ों से उम्र साबित हो तो बोन टेस्ट की जरूरत नहीं: हाईकोर्ट

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि उपलब्ध दस्तावेज़ों से यह प्रमाणित हो जाए कि आरोपी घटना के समय नाबालिग था, तो उसकी उम्र निर्धारित करने के लिए बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट (हड्डी परीक्षण) कराना आवश्यक नहीं है।
न्यायमूर्ति मनीष कुमार ने किशोर न्याय (बालकों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 94 का हवाला देते हुए कहा कि उम्र निर्धारण के लिए सबसे पहले दस्तावेज़ों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि स्कूल प्रमाणपत्र या जन्म प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज़ यदि उपलब्ध हों और उनसे उम्र स्पष्ट हो रही हो, तो मेडिकल परीक्षण की आवश्यकता नहीं होती। मेडिकल जांच केवल तभी कराई जानी चाहिए, जब ऐसे दस्तावेज़ उपलब्ध न हों।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यदि दस्तावेज़ों से ही यह साबित हो रहा है कि आरोपी घटना के समय 16 वर्ष से कम उम्र का था, तो जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड द्वारा ऑसिफिकेशन टेस्ट कराने का आदेश देना उचित नहीं है।
मामले में अदालत ने पाया कि उपलब्ध दोनों दस्तावेज़ों में आरोपी की उम्र 16 वर्ष से कम दर्शाई गई थी। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को गलत ठहराते हुए संशोधन याचिका स्वीकार कर ली।

