बुल्डोजर नीति से इलाहाबाद हाईकोर्ट नाराज, अपराधी के आवास को सरकार को विध्वंस का अधिकार कैसे

प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रदेश में किसी भी अपराध के बाद बुलडोजर कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। पूछा है कि क्या इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2024 के दिशा निर्देश का पालन नहीं किया जा रहा है। हमीरपुर के फहीमुद्दीन व दो अन्य को अंतरिम राहत देते हुए न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन तथा न्यायमूर्ति सिद्धार्थनंदन की खंडपीठ ने सवाल उठाया है कि अपराधी के आवास को राज्य को विध्वंस करने का अधिकार है! अथवा उसे नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए? अपराध के बाद तुरंत विध्वंस करना क्या कार्यपालक विवेक का विकृत प्रयोग है? और विध्वंस की “उचित आशंका” ही लोगों के पास अदालत जाने का आधार हो सकती है। प्रकरण में अगली सुनवाई नौ फरवरी को होगी।
मुकदमे से जुड़े संक्षिप्त तथ्य यह हैं कि भरुआ सुमेरपुर में वार्ड 11 थोकचंद निवासी याचीगण के रिश्तेदार अफान के खिलाफ पोक्सो एक्ट की धारा 3/4 और उत्तर प्रदेश अवैध धार्मिक रूपांतरण निषेध अधिनियम की धारा 3/5(1) के तहत सुमेरपुर थाने में केस दर्ज किया गया है। भीड़ ने उनका मकान घेर लिया था। तीसरी याची जैबुन निशा के नाम पंजीकृत इंडियन लाज को प्रतिवादियों ने सील कर दिया है। याची क्रमांक दो मोइनुद्दीन के नाम आरा मिल जिलाधिकारी के आदेश से 11 फरवरी 2025 को सील कर दी गई है। याचीगण आपस में क्रमशः पुत्र, पिता और माता हैं। अभियुक्त अफान रिश्ते में फहीमुद्दीन का चचेरा भाई तथा अन्य दोनों का भतीजा है। याचीगण ने आशंका जताई है कि उनकी संपत्तियों पर बुलडोजर चलाया जा सकता है। राज्य सरकार की तरफ से अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी द्वारा याचिका पर यह कहते हुए प्रारंभिक आपत्ति उठाई गई कि यह प्री-मेच्योर है। याचीगण को केवल नोटिस जारी की गई है,जिसका उन्हें जवाब देना है। आवास और लॉज को सील नहीं किया गया है। साथ यह तथ्य छिपाया है कि आरा मिल को प्रतिबंधित (नीम और ढाक) के कारण सील कर दिया गया था। राज्य सरकार की तरफ से यह आश्वासन दिया गया कि बिना कानूनी प्रक्रिया का पालन किए और याचीगण को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिए बिना कोई विध्वंस नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने कहा, इस अदालत ने ऐसे कई मामलों को देखा है जहां अपराध के बाद तुरंत अपराधी के रहने वाले स्थान को विध्वंस का नोटिस जारी किया जाता है और फिर कानून की प्रक्रियाओं का पालन करने के बाद विध्वंस किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है कि सजा के तौर पर विध्वंस कार्यवाही नहीं हो सकती है , सरकार फैसला नहीं दे सकती, यह न्यायपालिका की शक्ति है। इस अदालत ने महसूस किया है कि राज्य के विध्वंस अधिकार और नागरिकों के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत अधिकारों के बीच संतुलन बनाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर देना आवश्यक है। अदालत ने अंतरिम आदेश में याचीगण की सुरक्षा के लिए पुलिस को निर्देशित करते हुए कहा है कि संपत्तियों तक उनकी पहुंच सुनिश्चित रहेगी। राज्य सरकार के अतिरिक्त प्रधान सचिव (राजस्व/शहरी विकास),जिलाधिकारी,एसपी एसडीएम,थानाध्यक्ष, डीएफओ वन विभाग तथा कार्यकारी अधिकारी नगर पालिका परिषद प्रकरण में प्रतिवादी बनाए गए हैं।

