“पत्रकार पर FIR नहीं, सच पर हमला है” सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश: अभिव्यक्ति की आज़ादी को दबाने वालों को चेतावनी, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को मिली बड़ी न्यायिक ढाल

नई दिल्ली। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की भूमिका को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण रुख अपनाते हुए संकेत दिया है कि पत्रकारों को डराने, दबाने या चुप कराने के लिए एफआईआर का दुरुपयोग स्वीकार नहीं किया जा सकता। हाल ही में Writ Petition (Criminal) No. 402/2024, दिनांक 04.10.2024 की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने उस प्रवृत्ति पर चिंता जताई, जिसमें सिस्टम की खामियां उजागर करने वाले पत्रकारों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज करा दिए जाते हैं। मामले में एक पत्रकार द्वारा प्रशासनिक अनियमितताओं को सामने लाने के बाद उस पर एफआईआर दर्ज की गई थी, जिस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि कानून को प्रतिशोध या दबाव के औज़ार में नहीं बदला जा सकता। इस टिप्पणी को प्रेस स्वतंत्रता के पक्ष में एक मजबूत न्यायिक संदेश माना जा रहा है। भारतीय लोकतंत्र को चार स्तंभों—विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया—पर आधारित माना जाता है, जिसमें मीडिया को “चौथा स्तंभ” इसलिए कहा जाता है क्योंकि वही जनता और सत्ता के बीच सच की कड़ी बनता है। यदि पत्रकार ही डर जाएँ तो भ्रष्टाचार छिप जाएगा, गरीब और पीड़ित की आवाज दब जाएगी, सरकारी तंत्र में जवाबदेही कम हो जाएगी और सत्ता की मनमानी बढ़ सकती है। हाल के वर्षों में यह प्रवृत्ति देखी गई है कि सवाल उठाने वालों, घोटाले उजागर करने वालों या प्रशासनिक कमियों पर रिपोर्ट करने वालों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए जाते हैं, जिससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर दबाव बनता है। सुप्रीम कोर्ट के रुख से यह संदेश निकलता है कि एफआईआर किसी को डराने का औजार नहीं हो सकती, अभिव्यक्ति की आज़ादी को अपराध नहीं माना जा सकता और खोजी पत्रकारिता को दबाना लोकतांत्रिक भावना के विरुद्ध है। यह दृष्टिकोण केवल पत्रकारों की सुरक्षा का विषय नहीं, बल्कि हर नागरिक के अधिकारों से जुड़ा है, क्योंकि पत्रकार जनता की ओर से सवाल उठाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायपालिका का यह रुख लोकतांत्रिक संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकता है। साथ ही समाज की भी जिम्मेदारी है कि निष्पक्ष पत्रकारिता का समर्थन करे, फर्जी मुकदमों का विरोध करे और सच सामने लाने वालों की सुरक्षा के पक्ष में आवाज उठाए, क्योंकि जिस समाज में सच बोलने वाले अकेले पड़ जाते हैं, वहां जनतंत्र कमजोर होने लगता है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी इसी बात का संकेत है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति, सवाल और सच को पूरी तरह दबाया नहीं जा सकता।
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